*एसआईआर की आंधी में बंगाल की सियासत क्या ममता का किला डगमगाएगा और क्या भाजपा बना सकती है नई जमीन* पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का ऐलान होते ही देश की राजनीति का केंद्र एक बार फिर पूर्वी भारत बन गया है। असम केरल तमिलनाडु पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव केवल सरकार बदलने की लड़ाई नहीं हैं बल्कि कई बड़े राजनीतिक संदेश भी तय करेंगे। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा जिस राज्य को लेकर हो रही है वह पश्चिम बंगाल है। इसकी वजह है मतदाता सूची की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी एसआईआर और उसके बाद लाखों नामों का कटना। यही प्रक्रिया इस चुनाव को पहले से कहीं अधिक कठिन बना रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी फिर सरकार बना पाएंगी या भाजपा इस बार अपनी बढ़त को सत्ता में बदल सकती है। एसआईआर प्रक्रिया इस चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना बनकर सामने आई है। पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के दौरान लगभग साठ लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। अभी भी लाखों नामों की जांच जारी है। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि इस प्रक्रिया से उनके पारंपरिक वोट बैंक को नुकसान पहुंचाया गया है। खासकर अल्पसंख्यक बहुल जिलों में बड़ी संख्या में नाम हटने से ममता बनर्जी इसे बंगाल की अस्मिता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देख रही हैं। ममता बनर्जी इस मुद्दे को सीधे केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही हैं। उनका दावा है कि यह प्रक्रिया बंगाल की जनता के अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास है। इसी कारण वह अपने चुनावी अभियान में बार बार बांग्ला अस्मिता की बात उठा रही हैं। पिछले चुनावों में भी उन्होंने इसी भावनात्मक मुद्दे के जरिए भाजपा को चुनौती दी थी। इस बार भी उनका भरोसा इसी रणनीति पर है। उनके लिए यह चुनाव केवल सत्ता बचाने का नहीं बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। हालांकि स्थिति इस बार पहले से अलग है। पिछले पांच वर्षों में ममता सरकार पर कई भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाला कोयला तस्करी और अन्य मामलों में कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई। इससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा है। विपक्ष इन मामलों को लगातार चुनावी मुद्दा बना रहा है। भाजपा और वाम कांग्रेस गठबंधन दोनों ही इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इन आरोपों की चर्चा है। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक रणनीति को सामाजिक योजनाओं पर केंद्रित रखा है। लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता बढ़ाना युवा साथ योजना के माध्यम से बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता देना और अन्य कल्याणकारी योजनाएं उनके अभियान का मुख्य हिस्सा हैं। पिछले चुनाव में महिला वोटरों का बड़ा समर्थन उन्हें मिला था। इस बार भी वह उसी समर्थन को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देना उनके चुनावी अभियान का केंद्रीय संदेश बन चुका है। फिर भी चुनावी समीकरण पूरी तरह उनके पक्ष में दिखाई नहीं देते। एसआईआर प्रक्रिया के कारण मतदाता सूची से नाम कटने का प्रभाव कई सीटों पर पड़ सकता है। यदि वास्तव में बड़ी संख्या में तृणमूल समर्थक मतदाता सूची से बाहर हुए हैं तो इसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ममता बनर्जी इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहा है और कानूनी स्तर पर इसकी समीक्षा भी हो रही है। दूसरी ओर भाजपा इस चुनाव में पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सत्तर से अधिक सीटें जीतकर राज्य में मजबूत विपक्ष की भूमिका हासिल की थी। तब से पार्टी लगातार अपने संगठन को मजबूत कर रही है। केंद्रीय नेतृत्व भी बंगाल पर विशेष ध्यान दे रहा है। भाजपा की रणनीति दो स्तर पर काम कर रही है। पहला स्तर है पहचान की राजनीति जिसमें राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। दूसरा स्तर है भ्रष्टाचार के आरोपों के माध्यम से तृणमूल सरकार को घेरना। भाजपा को इस बार कुछ नए राजनीतिक अवसर भी मिल रहे हैं। वाम और कांग्रेस का गठबंधन अभी भी अपने पुराने जनाधार को पूरी तरह वापस नहीं ला पाया है। इससे विपक्षी वोटों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर जा सकता है। कई क्षेत्रों में भाजपा खुद को तृणमूल के मुख्य विकल्प के रूप में स्थापित करने में सफल रही है। यही कारण है कि कई विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा की सीटों में इस बार और वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक टकराव भी भाजपा के लिए चुनावी मुद्दा बन रहा है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि राज्य में विकास के लिए केंद्र और राज्य की एक ही राजनीतिक धारा होना जरूरी है। बुनियादी ढांचे रोजगार और निवेश जैसे मुद्दों को भी पार्टी प्रमुखता से उठा रही है। बंगाल के औद्योगिक विकास की धीमी गति को भाजपा अपने अभियान में बार बार सामने ला रही है। फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ममता बनर्जी की सरकार निश्चित रूप से गिर जाएगी। बंगाल की राजनीति में उनका व्यक्तिगत प्रभाव अभी भी बहुत मजबूत है। ग्रामीण क्षेत्रों में तृणमूल का संगठन गहराई तक फैला हुआ है। पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा स्तर तक पार्टी की पकड़ मजबूत मानी जाती है। यही कारण है कि कई कठिन परिस्थितियों के बावजूद ममता बनर्जी ने पिछले चुनावों में अपनी स्थिति बनाए रखी है। ममता की सबसे बड़ी ताकत उनका करिश्माई नेतृत्व और जमीनी राजनीति है। वह लगातार लोगों के बीच जाकर अपनी छवि एक संघर्षशील नेता के रूप में बनाए रखती हैं। बांग्ला अस्मिता का मुद्दा भी उनके लिए मजबूत राजनीतिक हथियार है। यदि वह इस भावनात्मक मुद्दे को सफलतापूर्वक जनता तक पहुंचा पाती हैं तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भ्रष्टाचार के आरोप एसआईआर प्रक्रिया से उपजा विवाद और भाजपा की बढ़ती संगठनात्मक ताकत इन सबका संयुक्त प्रभाव चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है। यदि विपक्षी वोटों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में एकजुट होता है तो तृणमूल के लिए चौथी बार सत्ता मंा वापसी आसान नहीं होगी। इस तरह पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक बन सकता है। एक तरफ ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक विरासत और सत्ता बचाने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं। दूसरी तरफ भाजपा इस अवसर को राज्य में पहली बार सत्ता तक पहुंचने के रूप में देख रही है। एसआईआर प्रक्रिया ने इस मुकाबले को और भी जटिल बना दिया है। आने वाले हफ्तों में चुनावी अभियान और तेज होगा और इसी के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि बंगाल की जनता बदलाव चाहती है या फिर ममता बनर्जी को एक और मौका देना चाहती है। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 17 मार्च 26