अंतर्राष्ट्रीय
21-Mar-2026


दुबई में जोरदार धमाके, ईरान के ताबड़तोड़ हमलों से बैकफुट पर ट्रंप जंग खत्म करने की सोच रहा अमेरिका -ईरान बोला- सिर्फ सीजफायर नहीं, जंग पूरी तरह खत्म होने की गारंटी चाहिए नई दिल्ली(ईएमएस)। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। ईरान ने शनिवार को हिंद महासागर में स्थित अमेरिका और ब्रिटेन के रणनीतिक सैन्य बेस डिएगो गार्सिया पर दो मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं। इस हमले के तुरंत बाद दुबई में भी एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव होने और जोरदार धमाकों की आवाज सुनाई दी। हिंद महासागर में युद्ध का ये विस्तार 4 मार्च को अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस देना को डुबाने के बाद हुआ है, जिसमें 85 से अधिक लोग मारे गए थे। ईरान ने शनिवार को हिंद महासागर में स्थित संयुक्त अमेरिका-ब्रिटेन सैन्य बेस डिएगो गार्सिया पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इन हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बैकफुट पर आ गए हैं। उनका कहना है कि अब अमेरिका युद्ध खत्म करने की बात पर विचार-विमर्श करेगा। वहीं ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए सिर्फ सीजफायर काफी नहीं है, बल्कि इसका पूरी तरह अंत होना चाहिए। ईरानी क्षेत्र से लगभग 4,000 किलोमीटर दूर स्थित इस ठिकाने पर ये अब तक का सबसे बड़ा और दुर्लभ हमला है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने पुष्टि की है कि ईरान की ओर से दागी गई दोनों मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया गया है। अधिकारियों ने कहा कि एक मिसाइल उड़ान के बीच में ही विफल हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत से लॉन्च किए गए इंटरसेप्टर ने हवा में ही तबाह कर दिया। डिएगो गार्सिया चागोस द्वीप समूह में स्थित है और ये अमेरिका-ब्रिटेन का महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा है जो अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी बमबारी ऑपरेशन के लिए स्टेजिंग हब के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। ईरान द्वारा डिएगो गार्सिया को निशाना बनाना सैन्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गया है। अब तक ये माना जाता था कि ईरान की मिसाइल रेंज सीमित है, लेकिन 4,000 किमी दूर हमला करने की कोशिश ये संकेत देती है कि तेहरान अब यूरोप में स्थित ठिकानों को भी निशाना बनाने की क्षमता रखता है। पेंटागन ने फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन रणनीतिकारों का मानना है कि इससे युद्ध का भूगोल पूरी तरह बदल गया है। जंग खत्म होने की गारंटी चाहिए ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए सिर्फ सीजफायर काफी नहीं है, बल्कि इसका पूरी तरह अंत होना चाहिए। अराघची ने कहा कि यह युद्ध हमारा नहीं है, इसे हम पर थोपा गया है। जब हम अमेरिका के साथ बातचीत कर रहे थे, तभी हम पर हमला किया गया, जो पूरी तरह गैरकानूनी और बिना उकसावे के था। उन्होंने कहा कि ईरान जो भी कर रहा है, वह आत्मरक्षा के तहत कर रहा है और वह जरूरत पडऩे पर और जितने समय तक जरूरी होगा, अपनी रक्षा करता रहेगा। अराघची ने साफ कहा कि ईरान सीजफायर को स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वह पिछले साल जैसी स्थिति दोबारा नहीं चाहता। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह युद्ध पूरी तरह और हमेशा के लिए खत्म करने की गारंटी चाहिए, ताकि भविष्य में दोबारा ऐसी स्थिति न बन सके। अराघची ने यूके को दी चेतावनी उधर, ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की कड़ी आलोचना की है। अराघची ने कहा कि स्टार्मर अपने ही लोगों की इच्छा के विरुद्ध जाकर ब्रिटिश ठिकानों को ईरान के खिलाफ आक्रामकता के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दे रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे ब्रिटिश नागरिकों की जान खतरे में पड़ रही है और ईरान अपने आत्मरक्षा (सेल्फ डिफेंस) के अधिकार का इस्तेमाल करेगा। ईरान का मानना है कि ब्रिटेन का ये कदम उसे युद्ध में सीधे तौर पर घसीट रहा है। वहीं, डिएगो गार्सिया पर हमले के बीच संयुक्त अरब अमीरात के शहर दुबई में भी तनाव फैल गया है। शहर के कई हिस्सों में धमाकों की आवाजें सुनाई दीं, जिसके बाद प्रशासन ने स्पष्ट किया कि एयर डिफेंस सिस्टम ने एक हवाई खतरे को सफलतापूर्वक नाकाम कर दिया है।अधिकारियों ने जनता से अपील की है कि वो किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें। युद्ध की ये लहर अब खाड़ी देशों के पर्यटन और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन रही है। खाड़ी देशों में बढ़ सकता था असंतोष खाड़ी देशों में असंतोष बढऩे की आशंका इसलिए मजबूत हो गई क्योंकि लंबे समय से ये देश अमेरिका को अपनी सुरक्षा का सबसे बड़ा भरोसेमंद साथी मानते रहे हैं। सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत जैसे देशों ने अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को अपने यहां जगह दी, अरबों डॉलर के रक्षा समझौते किए और क्षेत्रीय रणनीति में अमेरिका के साथ खड़े रहे। बदले में उन्हें यह उम्मीद थी कि किसी भी बड़े खतरे की स्थिति में अमेरिका उनकी सुरक्षा की गारंटी देगा। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इस भरोसे को झटका दिया। जब इस्राइल और अमेरिका की कार्रवाई के बाद ईरान ने जवाबी हमले किए, तो निशाना वही खाड़ी देश बने जो अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। कतर के गैस प्लांट पर हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इससे इन देशों में यह भावना मजबूत हुई कि वे एक ऐसे संघर्ष में घसीटे जा रहे हैं, जिसका फैसला उन्होंने खुद नहीं लिया। इस स्थिति ने अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खाड़ी देशों को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं वे बड़े शक्ति संघर्ष में मोहरा न बन जाएं। विनोद उपाध्याय / 21 मार्च, 2026