नई दिल्ली(ईएमएस)। बीते 13 साल से कोमा की स्थिति से जूझ रहे गाजियाबाद के हरीश राणा के पिता को बेटे की इच्छामृत्यू के लिए करीब दो साल तक अदालत के चक्कर लगाना पड़े। पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की फिर सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी। ठीक इसके उलट नीदरलैंड की हट्टी-कट्टी 29 साल की महिला को इच्छामृत्यू आसानी से दी गई। जबकि न तो इनकी सेहत खराब थी और न ही ऐसी कोई खास परिस्थिति थी जिसकी वजह से उन्हे इच्छामृत्यू की अनुमति लेना पड़ी। केवल वे मानसिक तनाव, एंग्जायटी और ट्रॉमा से जूझ रहीं थी। इन दोनों मामले को देखते हुए एक बार फिर इच्छामृत्यू को लेकर भारत में बहस छिड़ गई है। यूरोपीय देश नीदरलैंड्स की 29 वर्षीय जोराया टेर बीक की इच्छामृत्यु को भी चर्चा में ला दिया है। हालांकि, जोराया और हरीश के मामलों में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां हरीश शारीरिक रूप से मृतप्राय थे, वहीं जोराया शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ थीं। उन्होंने वर्ष 2024 में असहनीय मानसिक पीड़ा के आधार पर अपनी जीवनलीला समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। वर्षों तक डिप्रेशन, एंग्जायटी और ट्रॉमा से जूझने के बाद उन्होंने तर्क दिया कि उनकी मानसिक स्थिति ने जीवन को जीने लायक नहीं छोड़ा है। साढ़े तीन साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद उन्हें अनुमति मिल गई। नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में जीवन की गुणवत्ता को सर्वोपरि माना जाता है, जहां मानसिक कष्ट को भी इच्छामृत्यु का वैध आधार माना गया है। इसके विपरीत, भारत में कानून अत्यंत सख्त हैं। यहाँ केवल पैसिव यूथिनेशिया की अनुमति है, वह भी तब जब मरीज के ठीक होने की कोई गुंजाइश न बची हो।आलोचकों का तर्क है कि मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति हमेशा स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता, जबकि समर्थकों का कहना है कि व्यक्ति को अपनी पीड़ा के स्वरूप के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। हरीश और जोराया की ये दो कहानियां दो अलग दुनियाओं की तस्वीर पेश करती हैं—एक जहां जीवन को हर हाल में बचाने का संघर्ष है, और दूसरी जहां असहनीय पीड़ा से मुक्ति को भी एक मौलिक अधिकार माना गया है। क्या किसी व्यक्ति की पीड़ा इतनी असहनीय हो सकती है कि उसे अपना जीवन समाप्त करने की कानूनी अनुमति दे दी जाए? क्या जीने का अधिकार अनिवार्य रूप से मरने के अधिकार को भी समाहित करता है? ये सवाल एक बार फिर वैश्विक विमर्श के केंद्र में हैं। भारत में गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैसिव यूथिनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मिलने के बाद इस संवेदनशील मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है। हरीश ने पिछले 13 साल कोमा में, जिंदगी और मौत के बीच एक खामोश जंग लड़ते हुए बिताए। लंबी कानूनी प्रक्रिया और मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों के बाद, अंततः उन्हें मशीनी जीवन से मुक्ति की इजाजत मिली। वीरेंद्र/ईएमएस/23मार्च2026 --------------------------------