तेहरान (ईएमएस)। वर्तमान में युदधग्रस्त देश ईरान की यूनिवर्सिटी में प्रवेश की परीक्षा कॉनकूर दुनिया की सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक है। इस परीक्षा को पास करना सिर्फ एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन में सफलता की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। हर साल लगभग 10 से 12 लाख छात्र इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन इनमें से बेहद कम छात्र ही सफलता हासिल कर पाते हैं। ईरान में इसे सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक भविष्य और करियर से सीधे जोड़कर देखा जाता है। कॉनकूर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह परीक्षा पूरे देश में एक ही दिन आयोजित होती है और इसी के आधार पर छात्रों को यूनिवर्सिटी और विषय दोनों मिलते हैं। अगर किसी छात्र का स्कोर कम रह जाता है, तो वह न तो प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पा सकता है और न ही अपनी पसंद का विषय चुन सकता है। यही कारण है कि यूनिवर्सिटी ऑफ तेहरान और शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलॉजी जैसी शीर्ष यूनिवर्सिटियों में प्रवेश बेहद कठिन हो जाता है, क्योंकि सीटें सीमित हैं और प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा। इस परीक्षा का सिलेबस भी बेहद व्यापक और कठिन होता है। इसमें गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, साहित्य, दर्शन, धर्म और विदेशी भाषाओं से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। प्रश्नों का स्तर ऐसा होता है कि केवल रटकर पास होना संभव नहीं होता, बल्कि विश्लेषणात्मक सोच और तार्किक क्षमता की जरूरत होती है। यही वजह है कि कई छात्र 2 से 3 साल तक सिर्फ इसी परीक्षा की तैयारी में जुटे रहते हैं और खास कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं। ईरान में कॉनकूर को लेकर दबाव इतना अधिक है कि कई समाजशास्त्री इसे “राष्ट्रीय परीक्षा तनाव” तक कहते हैं। परिवार अपने बच्चों के लिए विशेष माहौल तैयार करते हैं, जहां उनका पूरा ध्यान केवल पढ़ाई पर होता है। परीक्षा में नकल रोकने के लिए कड़े इंतजाम किए जाते हैं, जैसे मोबाइल प्रतिबंध, जैमर और कैमरों से निगरानी। इस परीक्षा ने ईरान में एक बड़ी कोचिंग इंडस्ट्री को भी जन्म दिया है, जिसकी तुलना भारत की जेईई और नीट तैयारी से की जाती है। कई कोचिंग शिक्षक वहां सेलिब्रिटी बन चुके हैं और उनकी किताबें व वीडियो छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। वहीं, ईरान की स्कूली शिक्षा प्रणाली भी मजबूत मानी जाती है, खासकर विज्ञान और गणित के क्षेत्र में। देश में साक्षरता दर लगभग 95 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और लड़कियों की शिक्षा में भी तेजी से वृद्धि हुई है। इस परीक्षा में सफलता को परिवार की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति से भी जोड़ा जाता है, जिससे छात्रों पर मानसिक दबाव और बढ़ जाता है। कॉनकूर का इतिहास 1960–70 के दशक से जुड़ा है और ईरान की इस्लामिक क्रांति 1979 के बाद भी यह प्रणाली जारी रही। समय के साथ यह और अधिक केंद्रीकृत और सख्त होती गई। सुदामा/ईएमएस 28 मार्च 2026