बड़बोले ट्रम्प को ईरान ने दिखाया आईना” राजनीति में ताकत का प्रदर्शन ही सबसे बड़ी रणनीति माना जाता है। इतिहास गवाह है, अति-आत्मविश्वास कई बार सबसे बड़ी कमजोरी और नुकसान का करण बन जाता है। वर्तमान में कुछ ऐसी ही स्थिति अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संदर्भ में देखने को मिल रही है। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद जिस तरह से उन्होंने दुनिया के देशों को टैरिफ युद्ध के माध्यम से हड़काकर स्वयंभू शांतिदूत के रूप में सारी दुनिया में स्थापित होना चाह रहे थे। 1 साल में ही वह “आसमान से गिरे, खजूर में अटके” वाली कहावत को चरितार्थ करते नजर आ रहे है। ट्रंप ने अपने कार्यकाल में खुद को एक आक्रामक और निर्णायक नेता के रूप में सारे विश्व के देशों पर अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश कर रहे थे। वैश्विक स्तर पर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे। मध्य-पूर्व देशों की जटिल राजनीति में उनका यह रवैया पिछले 1 वर्ष में चर्चाओं में बना रहा। इजराइल और फिलिस्तीन की लड़ाई में वह इजरायल के पक्ष में खड़े थे। गाजा में हजारों मासूम बच्चों और महिलाओं की हत्या हुई। रूस और यूक्रेन के युद्ध में वह नाटो देश और अमेरिका के मित्र देशों के साथ जिस तरह का व्यवहार कर रहे थे, इसका असर सारी दुनिया के देशों में देखने को मिला। इसराइल और ईरान के बीच बढ़ते हुए तनाव और इजराइल के साथ उनकी नजदीकी ने हालात को पेचीदा बना दिया है। इजराइल और ईरान के युद्ध मे अमेरिका को झोंक देने के कारण समय-समय पर तरह-तरह की बयानबाजी करने से आज ट्रंप सारी दुनिया में अलग-थलग पढ़ते चले जा रहे हैं। कहा जाता है, “ऊंट जब पहाड़ के नीचे आता है तब उसे अपनी असलियत समझ आती है। ट्रंप के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है। जो नेता खुद को विश्व राजनीति का निर्णायक मानकर अहंकार दिखा रहा था, अपने आपको दुनिया का सर्वशक्तिमान मानकर चल रहा था, आज वही ट्रम्प ऐसी स्थिति में फंस गये हैं, जहां से वह आगे भी नहीं बढ़ पा रहे हैं और नाही पीछे हट पा रहे हैं। पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह स्थिति “धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का” जैसी होती हुई दिख रही है। मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने सवाल खड़ा कर दिया है। क्या अमेरिका अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए अपनी रणनीति के तहत आगे बढ़ रहा है, या वह इजरायल के हितों के कारण स्वयं और अमेरिका को उलझाता जा रहा है। ईरान की ओर से हाल ही में मुस्लिम देशों को दिया गया संदेश इस पूरे परिदृश्य मे अमेरिका की स्थिति को और भी गंभीर बना रहा है। अरब देशों के साथ अमेरिका का कई दशकों से सुरक्षा संबंधी समझौता था। खाड़ी के अधिकांश देशों में अमेरिका ने अपने सैन्य अड्डे बनाए हुए थे। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का पूरा कारोबार डॉलर मुद्रा में होता था, जिसके कारण अमेरिका का एकाधिकार था। ईरान ने जिस तरह से खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को तबाह किया है, उसने असलियत सामने ला दी है। खाड़ी देशों को ईरान ने चेतावनी दी है वे अमेरिका की मदद नहीं करें। ईरान ने इस्लामी ब्रदरहुड की भावना को जागृत करते हुए कहा है जो देश अपनी जमीन को ईरान के ऊपर हमला करने के लिए उपलब्ध नहीं कराएंगे उनसे ईरान की कोई दुश्मनी नहीं है। हम सब मिलकर काम करेंगे। अमेरिका की दादागिरी नहीं सहेंगें। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं या आक्रामक बयानों से नहीं चलती है। इसमें संतुलन, कूटनीति और दीर्घकालिक सोच और लाभ-हानि की आवश्यकता से जुड़ी होती है। ट्रंप की नीतियाँ, उनके तरह-तरह के बयान, धमकी तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए जो दादागिरी और अहंकार कर रहे थे, ईरान ने अब उस पर तगड़ा वार किया है। अमेरिका ने जिन देशों को सुरक्षा देने का वचन दिया था वह सुरक्षा तो अमेरिका कर नहीं पाया। इस स्थिति में उठ रहे सवाल इसी बात की ओर इशारा करते हैं। केवल शक्ति प्रदर्शन से ना तो किसी देश पर कब्जा किया जा सकता है, नाही किसी समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। अमेरिका और इजरायल ने क्या सोचकर ईरान के ऊपर हमला किया था यह तो अमेरिका और इजराइल ही जानते हैं लेकिन अब जिस तरीके की स्थिति बन गई है, उसमें ट्रंप ना तो वहां से निकल पा रहे हैं और आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। वर्तमान स्थिति का घटनाक्रम अहंकारी राजनेताओं को महत्वपूर्ण सीख देता है। राजनीति और सत्ता के वैश्विक मंच पर हर कदम को सोच-समझकर उठाना जरूरी होता है। बड़बोलेपन और अहंकार की राजनीति लंबे समय तक टिक नहीं पाती है। जब हकीकत सामने आती है, तो सबसे ताकतवर अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता भी असहज स्थिति में फंसते हैं। इस युद्ध के कारण जिस तरह से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का विरोध हो रहा है, अमेरिका में महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है। अमेरिका का आर्थिक संकट बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में अब उन्हें अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी से चुनौती मिलना शुरू हो गई है। उनके लिए अब राष्ट्रपति पद पर बने रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। युद्ध के लिए अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रयास करना पड़ रहा है। ईरान जैसे छोटे से देश से उन्हें इस तरह की चुनौती मिलेगी इसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो यह दोनों कहावतें सत्य होती प्रतीत हो रही हैं। एसजे/ईएमएस/29/03/2026