30-Mar-2026
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- एम्स भोपाल के डॉ. राघवेन्द्र कुमार विदुआ को ‘मिस्टर जस्टिस जगदीश शरण मिश्रा ओरेशन अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया भोपाल(ईएमएस)। एम्स भोपाल चिकित्सा अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में निरंतर नई ऊँचाइयाँ स्थापित कर रहा है, जिससे संस्थान के विशेषज्ञों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। इसी क्रम में फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र कुमार विदुआ को फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट शोध योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘माननीय न्यायमूर्ति जगदीश शरण मिश्रा ओरेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार इंडियन एकेडमी ऑफ बायोमेडिकल साइंसेज सम्मेलन (आईएबीएससीओएन 2026) के दौरान प्रदान किया गया, जो बीआईटीएस पिलानी गोवा परिसर में आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन में देश-विदेश के 350 से अधिक प्रख्यात वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों एवं शोधकर्ताओं ने भाग लिया। डॉ. राघवेंद्र कुमार विदुआ ने फॉरेंसिक मेडिसिन: बायोमेडिकल साइंसेज के माध्यम से अनसुलझी रहस्यों का समाधान विषय पर एक आमंत्रित व्याख्यान भी प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में उन्होंने मेडिको-लीगल जांचों में पारंपरिक व्यक्तिपरक व्याख्याओं से आगे बढ़ते हुए, उन्नत बायोमेडिकल तकनीकों के माध्यम से साक्ष्य-आधारित, वस्तुनिष्ठ निष्कर्षों की ओर संक्रमण पर जोर दिया। अपने व्यापक शोध कार्यों को प्रस्तुत करते हुए, डॉ. विदुआ ने विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्ष साझा किए, जिनमें भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा वित्तपोषित परियोजनाएं भी शामिल हैं। मृत्यु के समय का निर्धारण (टाइम सिंस डेथ) करने हेतु साइनोवियल द्रव, पेरिकार्डियल द्रव तथा सेरेब्रोस्पाइनल द्रव के जैव-रासायनिक विश्लेषण पर आधारित उनके शोध ने उच्च सटीकता प्रदर्शित की है, जिसके परिणाम अमेरिकन जर्नल ऑफ फॉरेंसिक पैथोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने मेडिको-लीगल जांचों में नमूनों के उचित संरक्षण (सैंपल प्रिज़र्वेशन) के महत्व पर भी विशेष प्रकाश डाला, ताकि फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में विश्लेषण के दौरान विश्वसनीय एवं सटीक परिणाम प्राप्त हो सकें। इस संदर्भ में उन्होंने एम्स भोपाल में विकसित अपने नवाचार—एक ‘सैंपल ड्रायर’—को प्रस्तुत किया, जिसके लिए कॉपीराइट प्राप्त हो चुका है। इस नवाचार के प्रायोगिक परिणाम फॉरेंसिक साइंस इंटरनेशनल में प्रकाशित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, डॉ. विदुआ ने यूएमआईडी (अज्ञात मृतकों एवं लापता व्यक्तियों की पहचान पोर्टल एवं डीएनए डेटाबेस) पर आधारित एक बहु-केंद्रीय परियोजना में अपने योगदान को भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार अज्ञात व्यक्तियों से संबंधित डेटा को व्यवस्थित रूप से संकलित कर यूएमआईडी पोर्टल पर अपलोड किया जाता है, जो एक राष्ट्रीय स्तर की पहचान प्रणाली है। उनकी प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण आकर्षण “लाइफ आफ्टर डेथ” विषय पर उनका अग्रणी शोध था, जिसमें मृत्यु के 24 घंटे तक मानव शुक्राणुओं के पोस्टमार्टम प्राप्ति पर भारत का पहला और विश्व का सबसे बड़ा अध्ययन शामिल है। यह महत्वपूर्ण शोध जर्नल ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन साइंसेज में प्रकाशन हेतु स्वीकृत हो चुका है। डॉ. राघवेंद्र विदुआ के कार्यों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपस्थित प्रतिनिधियों द्वारा व्यापक सराहना मिली। उनका शोध फॉरेंसिक जांचों में वैज्ञानिक सटीकता एवं वस्तुनिष्ठता बढ़ाने के लिए विभिन्न वैज्ञानिक विधाओं के बीच सहयोग के महत्व को रेखांकित करता है, जो अंततः न्याय प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्ध होगा। हरि प्रसाद पाल / 30 मार्च, 2026