मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक केस में अहम फ़ैसला सुनाया है कि किसी पर शक कितना भी गहरा क्यों न हो, सिर्फ़ उस शक के आधार पर आरोपी को सज़ा नहीं दी जा सकती। सिर्फ़ आरोपी पर शक काफ़ी नहीं है। अपने फ़ैसले में यह कहते हुए कि आरोपी का जुर्म मज़बूत सबूतों से साबित होना चाहिए, न्यायाधीश मनीष पितले और न्यायाधीश श्रीराम शिरसाट की बेंच ने आरोपी को बरी कर दिया और उसे मिली उम्रकैद की सज़ा रद्द कर दी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी आरोपी को एक या दो हालात के सबूतों के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती। उसके लिए सबूतों की चेन पूरी होनी चाहिए, तभी आरोपी को सज़ा दी जा सकती है, बॉम्बे हाई कोर्ट ने ठाणे सत्र न्यायालय द्वारा 2012 में भारतीय न्याय संहिता की धारा 302 के तहत मर्डर के आरोप में एक आरोपी को दी गई उम्रकैद की सज़ा रद्द कर दी है। हाई कोर्ट ने कहा, सिर्फ़ आरोपी पर शक काफ़ी नहीं है। न्यायाधीश मनीष पितले और न्यायाधीश श्रीराम शिरसाट की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी का जुर्म पक्के सबूतों के साथ साबित होना चाहिए। उन्होंने आरोपी को बरी कर दिया और उसे मिली उम्रकैद की सज़ा रद्द कर दी। * क्या है मामला? आरोपी का नाम संजय पोखरकर है। ठाणे सत्र न्यायालय ने 2012 में उसे एक 18 साल के लड़के की हत्या के मामले में दोषी पाते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। पीड़ित अपने दोस्त की शादी में गया था, लेकिन वह घर वापस नहीं लौटा। उसके बाद पुलिस को उसकी लाश मिली। पीड़ित की सोने की चेन संजय पोखरकर के पास मिली थी, और उसके खिलाफ कोई और सबूत नहीं था। इसलिए, सरकार का पक्ष मानते हुए, ठाणे सत्र न्यायालय ने सिर्फ इसी बात के आधार पर उसे हत्या के मामले में दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। * हाई कोर्ट ने सज़ा के खिलाफ आरोपी की अपील स्वीकारी पीड़ित की सोने की चेन आरोपी के पास मिली थी। अगर यह सच भी है, तो कोर्ट में यह सबूत भी पेश किया गया है कि उसने यह सोने की चेन गिरवी रखकर लोन लिया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में एक ज़रूरी बात कही कि सिर्फ़ इसलिए कि आरोपी के पास वह सामान मिला, इसका मतलब यह नहीं है कि वह हत्या का दोषी है। हाई कोर्ट ने आरोपी की सज़ा के खिलाफ़ अपील स्वीकार कर ली, उसकी सज़ा रद्द कर दी और उसे बरी कर दिया। संजय/संतोष झा-०१ अप्रैल/२०२६/ईएमएस