नई दिल्ली,(ईएमएस)। जस्टिस ज्योतिमॉल्य बागची के सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने और भविष्य में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बनने की संभावनाओं को लेकर अनोखे फैसले को उजागर करती है। वर्तमान में वे जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच में शामिल हैं, जो बंगाल में वोटर लिस्ट से जुड़े स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मामले की सुनवाई कर रही है। यह संयोग भी है कि बागची, जो कलकत्ता हाईकोर्ट से आए हैं, उसी राज्य से जुड़े संवेदनशील मुद्दे की सुनवाई कर रहे हैं। जस्टिस बागची का करियर सफल वकील के रूप में शुरू हुआ। उन्होंने बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की किताब “द्विखंडितो” पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ बंगाल सरकार को चुनौती देकर बड़ी जीत हासिल की थी। 2011 में जज बनने से पहले ही वे आपराधिक कानून के विशेषज्ञ माने जाते थे। वे अक्सर कहते हैं कि न्याय की असली समझ बारीकियों में छिपी होती है, लेकिन उसका आधार सही इरादा होता है। 2011 में जज बनने के बाद उनका कार्यकाल पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासन के साथ लगातार जुड़ा रहा। तभी ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। 2012 में जब ममता ने न्यायपालिका पर सवाल उठाए, तब उनके खिलाफ मानहानि का मामला लाने की मांग हुई। यह मामला जस्टिस बागची की बेंच में आया, लेकिन उन्होंने आगे बढ़ाने से इंकार किया। यह फैसला एक ओर मुख्यमंत्री के लिए राहत था, वहीं दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में उनके विश्वास को दर्शाता है। उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ 2021 में आया, जब उनका तबादला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट कर दिया गया। वहां भी उन्होंने अपनी साख मजबूत की। उनका शांत स्वभाव और संतुलित दृष्टिकोण उन्हें अन्य जजों से अलग बनाता है। सबसे अहम और असामान्य पहलू उनका सुप्रीम कोर्ट में चयन है। 6 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक दुर्लभ निर्णय लेकर उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया, जबकि वरिष्ठता सूची में वे 11वें क्रम पर थे। इस फैसले में 10 वरिष्ठ जजों को नजर अंदाज किया गया। आमतौर पर नियुक्तियां सीनियारिटी के आधार पर होती हैं, लेकिन इस मामले में दीर्घकालिक रणनीति को प्राथमिकता दी गई। कॉलेजियम का मानना था कि जस्टिस बागची लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट में सेवा दे सकते हैं और भविष्य में सीजेआई बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं। अनुमान है कि जस्टिस के. वी. विश्वनाथन के रिटायर होने के बाद मई 2031 में जस्टिस बागची देश के मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं। यह अपने आप में एक अनोखी बात है कि किसी जज का चयन इस दृष्टि से किया गया कि वह आगे चलकर सीजेआई बने। इसके अलावा, इस निर्णय के पीछे क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का भी तर्क था। 2013 में जस्टिस अल्तमस कबीर के रिटायरमेंट के बाद से कलकत्ता हाईकोर्ट से कोई भी सीजेआई नहीं बना था। उस समय सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता ही वहां से एकमात्र प्रतिनिधि थे। हालांकि 10 वरिष्ठ जजों में से 4 कलकत्ता हाईकोर्ट से थे, लेकिन वे सभी जल्द ही रिटायर होने वाले थे। इस तरह, जस्टिस बागची का चयन केवल वर्तमान योग्यता या वरिष्ठता के आधार पर नहीं, बल्कि भविष्य की नेतृत्व क्षमता, लंबी सेवा अवधि और न्यायपालिका में संतुलित प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखकर किया गया एक रणनीतिक और दूरदर्शी फैसला था। आशीष दुबे / 07 अप्रैल 2026