-सरकार की महत्वाकांक्षी कामधेनु योजना के तहत आए आवेदनों से हुआ खुलासा भोपाल (ईएमएस)। दुग्ध उत्पादन और पशुपालन के क्षेत्र में मप्र के किसानों का मिजाज तेजी से बदल रहा है। आज के दौर में जहां गायों की उन्नत नस्लें जैसे साहीवाल या गिर बेहतरीन दुग्ध उत्पादन के लिए जानी जाती हैं, लेकिन प्रदेश के किसान इन सभी उन्नत नस्लों की गायों को छोड़ दूध उत्पादन के लिए भैंस पालने को ही तरजीह दे रहे हैं। इस रोचक तथ्य का खुलासा सरकार की महत्वाकांक्षी डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना के तहत आए आवेदनों से हुआ है। कई जिलों में पशुपालन के लिए ऋण लेने के लिए आवेदन करने वाले शत-प्रतिशत किसानों ने केवल भैंस पालन में ही रुचि दिखाई है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में किसानों की आय बढ़ाने के लिए उन्हें डेयरी उद्योग से जोड़ा जा रहा है। प्रदेश में डेयरी उद्योग को बढ़ाने के लिए राज्य सरकार द्वारा अप्रैल 2025 से शुरू की गई डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना में बैंक बड़ी बाधा बन रही है। राज्य सरकार इस योजना के तहत 33 फीसदी की सब्सिडी पर 42 लाख तक की राशि उपलब्ध करा रही है, लेकिन हितग्राहियों को बैंक से लोन सेंशन कराने में विभाग के पसीने छूट रहे हैं। पिछले 10 माह में इस योजना के तहत बैंकों से सिर्फ दो दर्जन लोगों को ही लोन दिया जा सका है। जिन लोगों को लोन दिया गया है उनमें से अधिकांश ने भैंसों पर ही भरोसा जताया है इसलिए भैंस पहली पसंद पशुपालकों के बीच भैंस की लोकप्रियता के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण सामने आए हैं। पहला दूध में फैट की मात्रा। प्रदेश के स्थानीय बाजारों में दूध की कीमत अक्सर उसमें मौजूद फैट (वसा) के आधार पर तय होती है। भैंस के दूध में गाय की तुलना में अधिक फैट होता है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं। दूसरा स्थानीय मांग। दरअसल, हलवाई, डेयरी संचालक और आम घरों में मावा और पनीर बनाने के लिए भैंस के गाढ़े दूध की मांग अधिक रहती है।तीसरा देखभाल और पारंपरिक सोच। प्रदेश के किसानों का मानना है कि भैंसों का प्रबंधन और उनका दूध बेचना स्थानीय परिस्थितियों में अधिक लाभदायक और आसान है। नस्ल सुधार के बावजूद गायों से दूरी विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार लगातार गायों की नस्ल सुधारने और उन्हें दुग्ध उत्पादन का मुख्य केंद्र बनाने का प्रयास कर रही है। लेकिन कामधेनु योजना के ये नतीजे बताते हैं कि धरातल पर किसान अभी भी भैंस पालन को ही सुरक्षित और मुनाफे का सौदा मान रहे हैं। 2600 से ज्यादा आए आवेदन, लोन दो दर्जन को ही अप्रैल 2025 से शुरू हुई डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना के तहत राज्य सरकार ने पहले साल 828 हितग्राहियों को लाभ दिए जाने का लक्ष्य रखा था। हालांकि डेयरी खोलने के लिए प्रदेश भर से 2600 से ज्यादा लोगों ने ऑनलाइन आवेदन जमा किए हैं। इनमें 8 जिलों से ही 1244 लोगों ने आवेदन किए हैं। इनमें सबसे ज्यादा राजगढ़ जिले से 296 आवेदन आए हैं। इसके अलावा शाजापुर से 174, मंदसौर से 167, उज्जैन से 132, गुना से 130, अशोक नगर से 119, विदिशा से 118 और सीहोर से 108 लोगों ने आवेदन किए हैं। सबसे कम 1-1 आवेदन अनूपपुर और सिंगरौली से आए हैं। इसके अलावा उमरिया से 4, सीधी से 5, शहडोल से 6, आगर मालवा से 9 और झाबुआ से 9 आवेदन ही आए हैं। पशुपालन विभाग ने एक जिले के लिए अधिकतम 22 से 29 डेयरी आवंटन का लक्ष्य रखा है। ऑनलाइन प्राप्त हुए आवेदनों की स्क्रूटनी के बाद स्टेट लेवल स्क्रूटनी कमेटी भी 652 डेयरी के आवेदनों को अपनी तरफ से हरी झंडी दे चुकी है। 33 फीसदी तक दिया जा रहा अनुदान इस योजना में डेयरी उद्योग के लिए राज्य सरकार द्वारा 42 लाख रुपए तक का लोन और 33 फीसदी तक सब्सिडी दी जा रही है। इस योजना में 25 देसी गाय की नस्ल के पशु (एक यूनिट) की डेयरी स्थापित करने के लिए 36 लाख रुपए का लोन दिया जाता है। जबकी क्रॉसब्रीड, हाईब्रिड और भैंस की एक यूनिट के लिए 42 लाख रुपए की राशि उपलब्ध कराई जाएगी। इसमें सामान्य और ओबीसी वर्ग को 25 फीसदी का अनुदान और अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लिए 33 फीसदी का अनुदान दिया जा रहा है। इस योजना के लिए लाभार्थी के पास कम से कम खुद या परिवार के नाम साढ़े 3 एकड़ भूमि होना आवश्यक है। इसके बाद तीन किस्तों में लोन की राशि दी जाती है। विनोद / 14 अप्रैल 26