ज़रा हटके
15-Apr-2026
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काबुल(ईएमएस)। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के संघर्ष विराम (सीजफायर) ने वैश्विक स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता का श्रेय आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान को एक मध्यस्थ के रूप में दिया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय पटल पर इस्लामाबाद की छवि में अचानक सुधार देखा गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को फ्रांस, तुर्की और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों से बधाई संदेश भी मिले, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही इशारा कर रही है।ताजा रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान की भूमिका वास्तव में किसी शक्तिशाली मध्यस्थ जैसी नहीं, बल्कि एक कुरियर या संदेशवाहक की तरह थी। विश्लेषणों में दावा किया गया है कि पाकिस्तान के पास न तो इतना राजनीतिक दबदबा था और न ही कोई ऐसा ठोस समाधान, जिससे वह वॉशिंगटन और तेहरान जैसे दो धुर विरोधियों को समझौते की मेज पर ला सके। असल में, पाकिस्तान सिर्फ एक ऐसा कूटनीतिक मुखौटा बना, जिसके पीछे चीन जैसे बड़े देश अपनी रणनीतियों को अंजाम दे रहे थे। इस घटनाक्रम की कड़ियाँ आठ अप्रैल के समझौते से जुड़ती हैं। रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की बीजिंग यात्रा के तुरंत बाद एक संयुक्त शांति योजना सामने आई, जिसके कई अंश बाद में अमेरिका-ईरान सीजफायर समझौते में दिखाई दिए। चीन ने इस प्रक्रिया में पर्दे के पीछे से काम किया। बीजिंग के लिए सीधे तौर पर सामने आना जोखिम भरा था, क्योंकि किसी भी विफलता से उसकी वैश्विक छवि को ठेस पहुँच सकती थी। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी यह स्वीकार करना राजनीतिक रूप से कठिन था कि वे बीजिंग के कूटनीतिक प्रभाव पर निर्भर हैं। ऐसे में पाकिस्तान ने उस खाली जगह को भरा, जिसे दोनों महाशक्तियाँ सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकती थीं। पाकिस्तान ने अमेरिका को एक ऐसा साझेदार उपलब्ध कराया जिसे वह दुनिया के सामने पेश कर सके, और चीन को एक ऐसा गुप्त रास्ता दिया जिसके माध्यम से वह ईरान पर अपना प्रभाव डाल सके। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान किसी भी समझौते के लिए पाकिस्तान के बजाय चीन को ही असली गारंटर के रूप में देखता है। संक्षेप में, पाकिस्तान ने केवल एक माध्यम के रूप में कार्य किया, जिसने बिना किसी निर्णय लेने की शक्ति के, बड़े देशों के संदेशों को सही पते पर पहुँचाने का काम किया। वीरेंद्र/ईएमएस 15 अप्रैल 2026