राष्ट्रीय
17-Apr-2026


प्रयागराज,(ईएमएस)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि कोई भी व्यक्ति कोर्ट से यह निर्देश नहीं मांग सकता कि जांच अधिकारी उसकी अपनी पसंद का हो, विशेषकर जो विशिष्ट जाति से संबंधित हो। जालौन निवासी गायत्री और तीन अन्य की आपराधिक याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकलपीठ ने यह टिप्पणी की। कोर्ट ने माना है कि मामले में प्रक्रिया का दुरुपयोग हुआ और प्रतिवादी पक्ष न्यायालय में साफ हाथों से नहीं पहुंचा है। इस मामले की अगली सुनवाई 30 अप्रैल को होगी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मुकदमे से जुड़े तथ्य ये हैं कि अपीलार्थियों की तरफ से उरई में एनसीआर दर्ज कराई थी। जांच के बाद चार आरोपितों लखन, नरेश, राम अवतार और राजू के खिलाफ चार्जशीट प्रस्तुत की गई। पूर्व में प्रतिवादी पक्ष के नरेश कुमार ने शिकायतकर्ताओं के खिलाफ आवेदन दिया था। इस पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के मुताबिक अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम में केस दर्ज किया गया था, लेकिन जांच में अपराध नहीं मिलने पर अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई। इसके बाद नरेश कुमार ने 29 सितंबर 2024 को तत्कालीन सीओ ओम प्रकाश सिंह , एसपी राकेश शंकर, प्रभारी निरीक्षक उरई कोतवाली संतोष सिंह, एसआइ चौकी प्रभारी कांशीराम कालोनी पंचहिलाल पाल और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लल्लन सिंह के खिलाफ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (पीए.) अधिनियम की धाराओं में विरोध पत्र दिया। मांग की कि दुर्भावनापूर्ण और पक्षपाती जांच के लिए पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। साथ ही अनुसंधान के लिए ऐसा संवेदनशील उप पुलिस अधीक्षक नियुक्त किया जाए जो अनुसूचित जाति से हो। इस विरोध याचिका को शिकायत के रूप में पंजीकृत कर बयान दर्ज किए गए। अपीलार्थियों को विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी अधिनियम, उरई ने समन जारी किया था। उन्होंने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। आवेदकों को 18 मई 2017 को राहत देते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस याचिका की सुनवाई में आवेदकों ने 15 मार्च 2024 को विशेष न्यायाधीश के समक्ष डिस्चार्ज आवेदन प्रस्तुत किया, जिसे पांच अगस्त 2024 को खारिज कर दिया गया। इस आदेश के विरुद्ध भी हाई कोर्ट में अपील की गई। कोर्ट ने कहा कि विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित समन आदेश और मूल शिकायत की सामग्री में स्पष्ट भिन्नता है। सिराज/ईएमएस 17अप्रैल26