नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर देश में इन दिनों व्यापक चर्चा और भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” कोई अलग से पारित कानून नहीं है, बल्कि यह वह लोकप्रिय नाम है जो सरकार ने संविधान (128वां संशोधन) विधेयक, 2023 को दिया था। यह विधेयक संसद द्वारा सितंबर 2023 में पारित हुआ और 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद इसे आधिकारिक रूप से संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के रूप में राजपत्र में प्रकाशित किया गया। संवैधानिक और कानूनी दस्तावेजों में इसी नाम का उपयोग होता है, जबकि “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” केवल एक राजनीतिक या लोकप्रिय संज्ञा है, जिसका कोई संवैधानिक महत्व नहीं है। 16 अप्रैल 2026 को भारत सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग द्वारा इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने की अधिसूचना जारी की गई। यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी कानून को प्रभावी बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में कोई असामान्यता नहीं है और यह पूरी तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसी बीच, 16 और 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में एक विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया। इस संशोधन का उद्देश्य 2023 के अधिनियम के कुछ प्रावधानों, विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन से जुड़े मुद्दों में बदलाव करना था। हालांकि, यह विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत प्राप्त नहीं कर सका और पारित नहीं हो पाया। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिनियम के लागू होने से पहले या बाद में उसमें संशोधन लाने का प्रयास करना विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे मूल कानून की वैधता या अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 2023 का अधिनियम आज भी पूरी तरह अस्तित्व में है और प्रभावी है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने आगामी चुनावों, विशेष रूप से तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की है। वहीं, सरकार ने विपक्ष पर महिला आरक्षण का विरोध करने का आरोप लगाते हुए देशभर में जनमत तैयार करने का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में विपक्ष पर लगाए गए आरोपों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। इसके जवाब में कांग्रेस ने उनके खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विशेषाधिकार प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। साथ ही, चुनाव आयोग में आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत भी दर्ज कराई गई है। मामला अब न्यायिक दायरे में भी पहुंच गया है, जहां सर्वोच्च न्यायालय में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या प्रधानमंत्री द्वारा सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया गया। निष्कर्षतः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जो भ्रम फैलाया जा रहा है, उसका मुख्य कारण इसके नाम और प्रक्रिया को लेकर अपर्याप्त समझ है। यह आवश्यक है कि संवैधानिक तथ्यों और विधायी प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से समझा जाए, ताकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर वास्तविकता को पहचाना जा सके। (लेखक प्रदेश विधानसभा के विधि विभाग के पूर्व कर्मी हैं) ईएमएस/24/04/2026