राज्य
02-May-2026
...


मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मुंबई से सटे भायंदर के 220 एकड़ नमक पैन (सॉल्ट पैन) भूमि पर केंद्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया है और कहा है कि यह जमीन 1870 के ऐतिहासिक समझौते के तहत एक निजी पक्ष की है। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अखंड की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि उस समय दिए गए भूमि अनुदान केवल उपयोग का लाइसेंस नहीं, बल्कि पूर्ण स्वामित्व अधिकार प्रदान करते थे। अदालत ने केंद्र के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें उसने 1935 के कानून का हवाला देते हुए नमक विभाग के तहत आने वाली जमीन पर अधिकार जताया था। नवंबर 1870 में तत्कालीन “सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया” ने रामचुंदर लक्सुमनजी और उनके उत्तराधिकारियों को भायंदर, घोड़बंदर और मीरा गांवों में लगभग 3,688 एकड़ जमीन 999 वर्षों के लिए दी थी। इसके बदले सालाना किराया 6,791 रुपये 9 आने 6 पैसे तय किया गया था। यह विवाद ब्रिटिश काल से चला आ रहा है, जिसमें केंद्र सरकार ने यह तर्क दिया कि लंबे समय तक नमक उत्पादन होने के कारण यह जमीन सरकारी हो जानी चाहिए। केंद्र ने 2019 में हाईकोर्ट का रुख किया था, जब 2018 में ठाणे की सिविल अदालत ने उसके दावे को खारिज कर दिया था। केंद्र ने यह भी दावा किया कि एस्टेट इन्वेस्टमेंट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और मीरा साल्ट वर्क कंपनी का इस जमीन पर कोई अधिकार नहीं है। साथ ही 1921 के बॉम्बे लैंड रेवेन्यू कोड के नियम 76 का हवाला दिया, जिसमें बिना अनुमति नमक उत्पादन पर रोक की बात कही गई है। हालांकि, अदालत ने कहा कि यह नियम केवल नियामक है, स्वामित्व से जुड़ा नहीं है। वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल ने तर्क दिया कि जमीन के एक हिस्से का नमक उत्पादन के लिए उपयोग करने से मालिकाना हक खत्म नहीं होता। हाईकोर्ट ने कहा कि 1870 का दस्तावेज स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि उस समय ब्रिटिश सरकार ने अपने राजस्व और स्वामित्व अधिकार छोड़कर जमीन का पूर्ण, हस्तांतरणीय और विरासत में मिलने वाला अधिकार निजी पक्ष को दे दिया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में नमक विभाग द्वारा दिए गए लाइसेंस या जमीन के उपयोग से स्वामित्व में कोई बदलाव नहीं होता। 1935 के भारत सरकार अधिनियम के तहत भी केंद्र का दावा इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि संबंधित जमीन उस अधिनियम की सूची में शामिल नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र का दावा पहली बार 1983 में सामने आया, जबकि 113 वर्षों तक इस पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई। महाराष्ट्र सरकार के दावे भी पहले ही अदालतों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जा चुके हैं। अंत में हाईकोर्ट ने ठाणे की ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि केंद्र सरकार 220 एकड़ जमीन पर अपना स्वामित्व साबित करने में विफल रही है और उसे इस जमीन पर कब्जे का अधिकार नहीं है। अदालत ने केंद्र द्वारा फैसले पर रोक लगाने की मांग भी खारिज कर दी। संजय/संतोष झा- ०२ मई/२०२६/ईएमएस