लेख
05-May-2026
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देश के लिए क्या दिशा संकेत? “लहर नहीं, प्रवृत्ति का संकेत है।” जैसा कि कहा जाता है—“पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती”, उसी प्रकार हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के चुनाव भी सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं राजनीतिक दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न रहे। ऐसे में सभी राज्यों के परिणामों को एक ही तराजू में तौलना न तो उचित है, न ही वैज्ञानिक। पिछले लेख में प्रस्तुत मेरा आकलन पूर्णतः सही सिद्ध नहीं हुआ—इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा प्रार्थी हूं। किंतु इन चुनावों में पिछले चुनावों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत, क्षेत्रीय विस्तार और प्रभाव में वृद्धि का मेरा आकलन सही सिद्ध हुआ। एग्जिट पोल—कितने ‘एग्जेक्ट’ (सही)? इन चुनावों ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि एग्जिट पोल कुछ “संकेत” तो दे सकते हैं, परंतु पूर्णरूप “सत्य” नहीं होते हैं। तमिलनाडु: बदलाव की दस्तक। सबसे बड़ा उलटफेर तमिलनाडु में हुआ, जहां सुपर स्टार थलपति विजय की मात्र 2 वर्ष 2 माह पूर्व गठित नई पार्टी तमिलगा वेत्री कडगम (टीवीके) पहले ही चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर जीत के एकदम निकट पहुंच कर पार्टी वह स्वयं के नाम (विजय) को सार्थक कर दिया। टीवीके का अर्थ तमिलों की विजय संगठन है। आगे कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार बनाने की भी पूरी संभावना है। सर्वे करने वाली समस्त एजेंसियों में से सबसे अधिक व सफल परिणाम देने वाली प्रतिष्ठित एक्सिस माई इंडिया ने ही 98 से 120 सीट मिलने का अनुमान दिया था। जबकि पोल ऑफ पोल में 10-40 सीटों का ही अनुमान था। एक्सिस माई इंडिया को जनता के एक्सेस (पहुंच) के लिए बधाइयां। यद्यपि इसके पूर्व विजय से भी बड़े प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार कमल हासन व रजनीकांत चुनावी राजनीति में असफल हो चुके हैं। असम आंदोलन प्रणेता आसु द्वारा स्थापित असम गण परिषद (अगप) ने अक्टूबर 1985 में गठन के मात्र 2 महीने के अंदर असम में सबसे तेज बहुमत से पहली बार क्षेत्रीय पार्टी की सरकार बनाकर विश्व में एक तरह का नया रिकॉर्ड बनाया। इसके पूर्व वर्ष 1982 में आंध्र प्रदेश के फिल्मी स्टार एन टी रामाराव द्वारा नई पार्टी बनाने के बाद मात्र 9 महीने में विधानसभा चुनाव में उतर कर 294 में से 201 सीटें प्राप्त कर भारी बहुमत से जीत प्राप्त की थी। टीवीके की सफलता भी बहुत कुछ वैसी ही है। स्पष्ट है तमिलनाडु में एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरती ताकत टीवीके ने पारंपरिक राजनीति को सफल चुनौती दी। फिल्मी पृष्ठभूमि से जुड़े नेतृत्व का प्रभाव यहां दिखा, जो दक्षिण भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। पश्चिम बंगाल: राष्ट्रीय राजनीति के भूकंप का केंद्र। राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से पश्चिम बंगाल के परिणाम सबसे अधिक चर्चा में रहकर महत्वपूर्ण हैं। यहां मुकाबला वैचारिक, संगठनात्मक और नेतृत्व—तीनों स्तरों पर कड़ा था। भाजपा ने जहां सर्वाधिक पूरी ताकत झोंक दी, वहीं ममता बनर्जी ने भी उतनी ही पूरी शक्ति के साथ सामना किया।परंतु परिणाम पिछले चुनाव की तुलना में बिल्कुल उलट आए (207-80) जो अमूनन लगभग एग्जिट पोल के अनुसार ही आये। लोकतंत्र का तकाजा है, ममता दीदी को अपने नाम के अनुरूप ममत्व दिखाते हुए परिणाम को स्वीकार कर हार को गले लगा लेना चाहिए। क्योंकि गले में हार शोभायमान होती है। केरल: वैचारिक राजनीति की निरंतरता। देश का सबसे अधिक पढ़ी-लिखी जनसंख्या तथा सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा देने वाला राज्य केरल में परंपरागत रूप से कांग्रेस और वामपंथ के बीच सीधा मुकाबला मुकाबले में अटल बिहारी वाजपेई के शब्दों में रोटी पलट दी गई। यह प्रणाम फिलहाल कांग्रेस के लिए भले ही “संजीवनी बूटी” हो, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पुनरुत्थान के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। परिणामों के स्पष्ट संदेश। इन परिणामों का स्पष्ट संदेश एक यह निकलता है, जहां कांग्रेस से भाजपा की सीधी लड़ाई है, वहां बीजेपी जीतती है। ऐसे प्रदेश असम व पुदुचेरी में कांग्रेस भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस के प्रभावशाली युवा तुर्क सांसद तरुण गोगोई जो असम में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, चुनाव हार गए। कांग्रेस को यहां चिंतन करने की महती आवश्यकता है। उपरोक्त परिणाम समग्र रूप से यह भी दर्शाते हैं कि भारतीय राजनीति में “वन साइज फिट्स ऑल” का सिद्धांत लागू नहीं होता है। मिथक बनाने या तोड़ने वाली एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी भाजपा। इस चुनाव ने कई मिथकों को तोड़ा है। यह भी स्पष्ट है, देश की एकमात्र पार्टी भाजपा ही है, जो हर मिथक को तोड़ने में सर्वाधिक माहिर है। पिछले कुछ वर्षों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाएं चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं। महिला, युवा, किसान और गरीब वर्गों को लक्षित योजनाओं ने वोटिंग व्यवहार को प्रभावित किया है। तथापि जहां भाजपा की सरकारों ने विभिन्न योजनाओं के माध्यम से डीबीटी देकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, की सरकारें फिर से बनाई है, परंतु वही फार्मूला दिल्ली में केजरीवाल के द्वारा अपनाने के बावजूद वे पिछले चुनाव में असफल गए और अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भी हार गई। ममता सरकार ने महिलाओं, युवाओं व किसानों के लिए कई योजनाओं के माध्यम से लगभग 3.80 करोड़ मतदाता को सीधे डीबीटी का लाभ दिया गया। याद कीजिए! 2021 के चुनावों में 2017 के चुनाव से ज्यादा सीटें ममता बनर्जी को तब मिली थी, जब उन्होंने लगभग 2.50 करोड़ मतदाताओं को कैश बेनिफिट दिया था। स्पष्ट है 2021 में पुनः सरकार में आने के बाद महिलाओं के लिए लक्ष्मीर भंडार योजना प्रारंभ कर हितग्राहियों की संख्या एक करोड़ 80 लाख बढ़ने के बावजूद उसका परिणाम नहीं मिला। मतलब साफ है, राष्ट्रीय स्तर पर कई मामले मामलों में भाजपा सरकार द्वारा वादा पूरा न कर पाने के बावजूद प्रदेश स्तर पर भाजपा के वादे पर जनता ज्यादा विश्वास कर कर उसे सत्ता पर पहुंचाती है। यह एक चिंतन का विषय समस्त विपक्षियों के लिए होना चाहिए। स्पष्ट है केवल आर्थिक लाभ ही जीत की गारंटी नहीं है। भारी सुरक्षा बलों की तैनाती! औचित्यपूर्ण। बंगाल में 2021 के चुनाव में 58 हत्याएं और 278 हिंसक घटनाओं की तुलना में शून्य मृत्यु और कुछ दर्जन छिटपुट घटनाएं होना इस बात को सिद्ध करता है कि चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से हुए जो बंगाल में देश के इतिहास में अभी तक के चुनाव में भारी भरकम अर्धसैनिक बलों की नियुक्तियों को सही सिद्ध करता है और यह दर्शाता है कि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लोकतंत्र में “भयमुक्त मतदान” आवश्यक शर्त है। तथापि कुछ मूर्धन्य पत्रकारों का यह कहना जरूर है कि ममता के राज्य पुलिस और कार्यकर्ताओं (जिन्हें कुछ क्षेत्रों में गुंडा कहां गया है), के आतंक को केंद्र के अर्ध सैनिक बलों के आतंक ने प्रतिस्थापित कर दिया। ध्रुवीकरण बनाम विकास? यह बहस जारी है कि चुनावों में ध्रुवीकरण कितना प्रभावी रहा। योगी आदित्यनाथ की बंगाल में 35 विधानसभा क्षेत्र में हुई सभा में भाजपा को पश्यति से सफलता प्राप्त की है यह भी भगवा आंधी का एक उदाहरण है। *जीत का उन्माद, हार की निराशा। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि जीत स्थायी नहीं होती,हार अंतिम नहीं होती। चुनावी रण में जीत हासिल करने के लिए भाजपा ने भी वही वामपंथी, ममता का )सरकारी) हिंसात्मक तरीका अपनाया। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई गठित होने वाली भाजपा सरकार पर अब बड़ा दायित्व आ गया है कि जिस प्रकार देश के अन्य प्रदेशों में शांति से चुनाव होते है, इन पांच सालों में भाजपा ऐसा ही शांति का वातावरण स्थापित करे? यह न केवल उसकी बडी उपलब्धि होगी, बल्कि इससे तथाकथित अलगाववादी तत्व भी कमजोर होगें। अलगाववादी वहीं पनपते हैं, जहां हिंसा का वातावरण होता है। पंजाब इसका बड़ा उदाहरण है। जबसे वहां शांति हुई है, अलगाववादी लगभग समाप्त हो गए हैं। “अति सर्वत्र वर्जयेत”—अर्थात किसी भी चीज़ की अति (अधिकता) हर जगह वर्जित है। यह सिद्धांत राजनीति पर भी उतना ही लागू होता है। बधाई और संदेश। जनादेश किसी एक दल की विजय भर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक सफलता है। विजेताओं को विनम्रता अपनानी चाहिए। पराजितों को आत्ममंथन करना चाहिए। ऐतिहासिक विजय के लिए प्रधानमंत्री मोदी व उनके सफल नेतृत्व को हार्दिक बधाईयां, और जो हारे है, उनको भी इस बात के लिए धन्यवाद कि उन्होंने लोकतंत्र के इस महायज्ञ में आहुति डालकर भागीदारी कर अपना महत्वपूर्ण योगदान किया। लेकिन इन बधाइयों से 27 लाख मतदाताओं को अलग करने के लिए मैं मजबूर हूं। क्योंकि जिनके मताधिकार उच्चतम न्यायालय ने छीने उनका कोई दोष सिद्ध नहीं था। लेकिन इसके विरुद्ध उन्होंने अपने संवैधानिक मताधिकार की प्राप्ति के लिए कोई गांधीवादी जन आंदोलन नहीं किया। अंतिम प्रश्न। यदि राजनीतिक विजय को “गंगोत्री से गंगासागर तक विस्तार” मान भी लें, तो भी मूल प्रश्न बना रहता है— क्या इससे व्यवस्था अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और जनहितकारी बनी है? या फिर— “राम तेरी गंगा मैली” जैसी स्थिति आज भी बनी हुई है? राजीव खंडेलवाल/05मई2026 (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)