पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आते ही देश की जनता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि असली सत्ता उसी के हाथ में है। लोकतंत्र की असली मदारी वहीं है। बाद में वह खुद तमाशा बन जाय यह दीगर बात है। उससे भी बड़ी बात यह कि उसका मूड किसी मौसम से कम नहीं। कब बदल जाए, किस दिशा में मुड़ जाए, इसका अनुमान लगाना तो दूर, खुद जनता को भी पहले से नहीं पता होता। गाँव की चौपाल से लेकर शहर की चाय की दुकानों तक, हर जगह एक ही चर्चा है, क्या सोच कर वोट दिया था, और हो क्या गया। यही लोकतंत्र का सबसे रोचक और रहस्यमय पक्ष है। चुनाव से पहले जनता बड़े-बड़े सपने बुनती है। सड़कें चमकेंगी, रोजगार की बारिश होगी, महँगाई गायब हो जाएगी। लेकिन जैसे ही मतदान संपन्न होता है, एक अजीब-सी शांति छा जाती है, मानो जनता खुद ही कह रही हो। अब पाँच साल की छुट्टी। इस बार का चुनावी मिजाज कुछ ऐसा रहा जैसे बरसात का मौसम, कभी तेज धूप, कभी घने बादल, तो कभी मूसलाधार बारिश। नेता लोग पूरी कोशिश में लगे रहे कि हवा का रुख समझ लें, लेकिन असली हवा तो जनता के मन में बहती है। और यह मन कब करवट ले ले, इसका पूर्वानुमान किसी मौसम विभाग के पास भी नहीं। लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है। यहाँ राजा कोई जन्म से नहीं होता, जनता उसे बनाती है। और वही जनता, जब मन भर जाता है, तो बड़े आराम से कह देती है अब बहुत हुआ, नीचे उतरिए। मतदान केंद्र पर उँगली पर स्याही लगते ही हर नागरिक के भीतर एक अदृश्य सत्ता जाग उठती है। वह खुद को देश का निर्णायक मानने लगता है। वोट डालकर बाहर निकलते समय उसके चेहरे पर जो संतोष होता है, वह किसी बड़े निर्णयकर्ता से कम नहीं होता। राजनीति भी कम दिलचस्प खेल नहीं है। चुनाव के समय हर गली-नुक्कड़ पर मीठी बातें, वादों की मिठाई और भविष्य के रंगीन सपनों की सजावट होती है। हर भाषण में उम्मीद की नई इमारत खड़ी की जाती है। लेकिन जैसे ही परिणाम आते हैं, जनता के मन में एक पुरानी घंटी बज उठती है, यह सब तो पहले भी सुना था! धीरे-धीरे जनता भी परिपक्व हो रही है। अब वह सिर्फ नारों से संतुष्ट नहीं होती। अब वह सवाल पूछती है—क्या बदला? कैसे बदला? हमारे जीवन में क्या फर्क आया? यह प्रश्न अब आम बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, क्योंकि जागरूक जनता ही असली ताकत होती है। लेकिन व्यंग्य का सबसे रोचक पहलू यह है कि जनता खुद भी कभी-कभी भूल जाती है। आज जिस पर नाराज होती है, कल उसी से फिर उम्मीदें बाँध लेती है। राजनीति का यह चक्र ऐसा है जिसमें हर पाँच साल में नए चेहरे, नए संवाद और नई परिस्थितियाँ सामने आती हैं, लेकिन कहानी का मूल ढाँचा लगभग वही रहता है। लोकतंत्र दरअसल एक विशाल रंगमंच है। इसमें जनता निर्देशक है, नेता अभिनेता हैं और चुनाव सबसे बड़ा मंचन। दिलचस्प बात यह है कि दर्शक भी वही जनता है, जो कभी ताली बजाती है, कभी हूटिंग करती है और कभी पूरी पटकथा ही बदल देती है। अब सबकी नजर अगले शो पर है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगली बार जनता कौन-सा नया मोड़ लेकर आती है। क्योंकि इस पूरे खेल का एक ही अटूट नियम है जनता का मन। और सच यही है कि इस मन को समझ पाना शायद भगवान के लिए भी आसान नहीं। (बरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 6 मई /2026