भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल का चुनाव भारी बहुमत से जीत लिया है। चुनाव लड़ने के पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपना लक्ष्य तैयार कर लिया था। उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद, सभी संवैधानिक शक्तियां, टीएमएसी में अपने जासूस भेजने से लेकर वह सभी काम किया, जो चुनाव को जीतने के लिए जरूरी था। प्यार और युद्ध में सब जायज है। युद्ध और प्यार का एक ही लक्ष्य होता है, जीतना- जीतना। भाजपा के रणनीतिकार अच्छी तरीके से यह बात जानते हैं। चुनाव जीतना कोई आसान काम नहीं है। इसमें नैतिकता, नियम या कानूनों का कोई लेना-देना नहीं है। जब भगवान राम युद्ध के दौरान विभीषण और भगवान कृष्ण अश्वत्थामा मारा गया, जैसी युक्ति अनैतिक लड़ाई जीतने के लिए अपना सकते हैं, तो ऐसी स्थिति में भाजपा के ऊपर जो आरोप लग रहे है, वह सब जायज हैं। यही कहा जा सकता है, जीतना ही प्रमुख लक्ष्य होता है। जो जीतता है, उसी के पास सत्ता होती है। जिसके पास सत्ता होती है, सारी शक्तियां उसी के नियंत्रण में काम करती हैं। जब राम और रावण का युद्ध चल रहा था। उस समय सभी नौ ग्रह रावण की कैद में थे। हनुमान जी नहीं होते, उन्होंने रावण की कैद से नौ ग्रहों को नहीं छुड़ाया होता, तो भगवान राम की जीत भी संभव नहीं होती। भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत गई है। ममता दीदी और उनकी पार्टी टीएमसी बुरी तरह से हार गई है। यही युद्ध का परिणाम है, जो जीता वही सिकंदर। इसके बाद अदालती और कोर्ट-कचहरी की लड़ाई लड़ते रहो, कुछ होने-जाने वाला नहीं है। जिसके पास सत्ता है, सारे ग्रह नक्षत्र उसी के ईशारे पर नाचेंगे। हारने वाले को यही ग्रह-नक्षत्र अपने इशारे पर नचायेंगे। पिछले कुछ वर्षों से यही होता हुआ दिख रहा है। कहा जाता है, लोकतंत्र में जनता मलिक होती है। जनता का राज होता है, पिछले एक दशक से जनता चुपचाप बैठी है। सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं में बैठे हुए पदाधिकारी सरकार के इशारे पर, जनता को अपने ईशारों पर नचा रहे हैं। भय और लालच से वशीभूत जनता चुपचाप तमाशा देख रही है। जब तक जनता में जागृति नहीं आयेगी, वह सत्ता के आगे गुलाम बनी रहेगी। जब जनता को अपनी ताकत का एहसास हो जाएगा, वह अपनी लड़ाई खुद लड़ना सीख जाएगी, तब जाकर वह स्वतंत्रता के साथ जीवन यापन करेगी। अभी तो जनता सत्ता के ऊपर निर्भर है। भाजपा जानती है, कैसे भी चुनाव जीतो और सत्ता पर काबिज हो जाओ। सत्ता की ताकत जब तक होगी, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। पिछले कुछ समय से भारत में यही देखने को मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कह दिया, महाराष्ट्र के राज्यपाल ने असंवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री ठाकरे की सरकार गिराई थी। अवैधानिक रूप से बनी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। न्यायपालिका और न्याय से आज तक कोई फैसला नहीं हो पाया। ममता बनर्जी ने कहा है, वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी, वह अपनी हार मानने को तैयार नहीं हैं। इससे कुछ होने जाने वाला नहीं है। राज्यपाल को अधिकार है, वह मुख्यमंत्री को बर्खास्त करके नए विधानसभा गठन की अधिसूचना जारी कर नई सरकार का गठन करा देंगे। नई सरकार बन जाएगी। जो भाजपा की होगी यही सत्य है। चुनाव को लेकर कोई शिकायत है, वह 45 दिन के अंदर हाईकोर्ट में याचिका दायर करे, वर्षों सुनवाई चलेगी। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जो भी फैसला करेंगे, उसका पालन होगा या नहीं यह भी भविष्य की गर्त होगा। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश चुनाव को लेकर किए थे। उनका पालन हरियाणा और अन्य याचिका पिटीशन में चुनाव आयोग ने नहीं किया, अभी भी यहां से वहां लोग घूम रहे हैं। 2 साल से ज्यादा का समय निकल चुका हैं। अभी तक ना तो कंट्रोल पैनल, ईवीएम मशीन तथा बीवीपेट की पर्चियां गिनी गई। तारीख पर तारीख का खेल चलता चला आ रहा है। जब याचिका पर फैसला आएगा, हो सकता है, उस समय तक दूसरी सरकार का गठन हो जाए। ऐसे फैसले का कोई वजूद भी नहीं होता है। इसलिए कहते हैं, जो जीता वही सिकंदर। खरबूजा छुरी के ऊपर गिरे या छुरी खरबूजे के ऊपर गिरे, कटना तो खरबूजे को ही है। जनता को जब तकलीफ होगी, तो वह सड़कों पर आएगी। यह बात पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली संसद में कह चुके हैं। नोटबंदी के बाद जब विपक्ष हंगामा कर रहा था, तब जेटली जी ने कहा था, जनता को तकलीफ होती, तो वह सड़कों पर होती। भाजपा अपनी और जनता की ताकत को अच्छी तरह से पहचानती है। जनता जब अपनी ताकत सड़कों पर दिखाएगी, तभी सत्ता में बैठे हुए लोग जनता की ताकत को समझेंगे। अंग्रेज भी जब भारत को छोड़कर गए थे। 1975 में जब जनता सड़कों पर थी। इंदिरा जी को आपातकाल लगाना पड़ा था। 1977 के चुनाव में इंदिरा जी को जनता ने हराया। जब तक वर्तमान राजनीतिक दल जनता की लड़ाई नहीं लड़ेंगे, जनता के साथ संवाद नहीं रखेंगे। तब तक उनका यही हाल होगा, जो अभी हो रहा है। लड़ाई को बराबरी से लड़ना होगा। सत्ता की ताकत से चुनाव लड़े जा रहे हैं, तो विपक्ष को भी जनता की ताकत के साथ सरकार का मुकाबला करना होगा। तभी जाकर विपक्षी दल अपने अस्तित्व को बचाकर रख पायेंगे। अन्यथा जिस तरह से क्षेत्रीय दल एक-एक करके खत्म हो रहे हैं। बचे-खुचे भी 1-2 वर्षों में खत्म हो जाएंगे। यह चेतावनी भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार की भूमि पर कई वर्ष पहिले दे चुके हैं। यही वर्तमान का सत्य है। ईएमएस / 06 मई 26