क्षेत्रीय
08-May-2026
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सारंगपुर (ईएमएस)। जीव आदिकाल से संसार में परिभ्रमण कर रहा है और मोह-माया के बंधनों में उलझा हुआ है। वर्तमान में पंचम काल चल रहा है, जिसमें सुख कम और दुख अधिक प्राप्त हो रहा है। ऐसे समय में भी यदि किसी व्यक्ति को आत्मिक सुख और शांति का अनुभव हो रहा है तो वह अत्यंत भाग्यशाली है। जगत का स्वामी बनने वाला ही अनंत सुख का अनुभव करता है, जबकि केवल एक वस्तु या व्यक्ति का स्वामी बनने वाला कभी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता। यह विचार आचार्य विराग सागर जी, आचार्य विशुद्ध सागर जी एवं आचार्य विनिश्चय सागर जी के शिष्य मुनिश्री प्रवर सागर महाराज ने महावीर दिंगबर जैन बडा मंदिर मे धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मंदिरों का निर्माण होना, पंचकल्याणक प्रतिमाओं का विराजित होना और धर्म प्रभावना के कार्यक्रम बढ़ना इस बात का संकेत है कि समाज में धर्म की प्रभावना निरंतर बढ़ रही है। मुनिश्री ने कहा कि भक्ति सदैव आत्म कल्याण की भावना से करनी चाहिए। आज अधिकांश लोग दिखावे और बनावट की भक्ति में लगे हुए हैं। लोग समाज को दिखाना चाहते हैं कि वे कितने बड़े भक्त हैं, जबकि वास्तविक भक्ति हृदय से होती है। जहां सच्ची आस्था और विश्वास होता है वहां बिगड़े हुए कार्य भी सफल हो जाते हैं, लेकिन यदि आस्था नहीं हो तो बने हुए कार्य भी बिगड़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा भक्त वह होता है जो आंखें बंद करके भी जिनेंद्र देव के दर्शन कर लेता है, जबकि आज व्यक्ति आंखें खुली रखकर भी वास्तविक दर्शन नहीं कर पा रहा है क्योंकि उसका मन संसार के आकर्षणों में भटक रहा है। मुनिश्री प्रवर सागर महाराज ने कहा कि नमोकार मंत्र ही आत्म कल्याण का सबसे बड़ा माध्यम है। यह मंत्र जीव को भीतर से शुद्ध करने और आत्मा को जागृत करने की शक्ति रखता है। उन्होंने सेठ सुदर्शन का उदाहरण देते हुए बताया कि दृढ़ श्रद्धा, संयम और धर्म के प्रति समर्पण से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अपने जीवन को सफल बना सकता है। उन्होंने वर्तमान समाज की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज चारित्र की पूजा कम और रूप की पूजा अधिक होने लगी है। व्यक्ति बाहरी आकर्षण को महत्व देता है, जबकि वास्तविक धर्म चारित्र और आचरण में बसता है। जहां चारित्र होता है वहीं धर्म का निवास होता है। मुनिश्री ने कहा कि धन, वैभव, प्रतिष्ठा और जीवन की सभी सुख-सुविधाएं पुण्य के उदय से प्राप्त होती हैं। इसलिए मनुष्य को सदैव अच्छे कर्म, संयम, दया और धर्म की भावना के साथ जीवन जीना चाहिए ताकि उसका वर्तमान और भविष्य दोनों सुधर सकें। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे - 8 मई /2026