नई दिल्ली (ईएमएस)। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम फैसले में हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए ऐसे व्यक्ति को जमानत दे दी है, जिसने जेल में बाइस साल से अधिक समय गुजार दिया है। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के रवैये पर गंभीर चिंता जताते हुए उसे “परेशान करने वाला” बताया और कहा कि न्याय केवल प्रक्रिया तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि संवेदनशीलता और व्यावहारिकता भी न्याय व्यवस्था का हिस्सा होनी चाहिए। मामला उस दोषी से जुड़ा है, जिसकी आपराधिक अपील उच्च न्यायालय ने केवल देरी के आधार पर खारिज कर दी थी। अपील दाखिल करने में करीब तीन हजार एक सौ सत्तावन दिनों की देरी हुई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों, सबूतों और गुण-दोष पर विचार किए बिना ही अपील सुनने से इनकार कर दिया। सर्वोच्च अदालत की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इतने लंबे समय से जेल में बंद व्यक्ति को कम से कम अपनी बात रखने और अपील पर सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था। अदालत ने यह भी माना कि दोषी को पूरे कारावास के दौरान एक बार भी पैरोल या अस्थायी रिहाई नहीं मिली, जबकि जेल में उसका आचरण संतोषजनक पाया गया है। शीर्ष अदालत ने संविधान प्रदत्त विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए दोषी को दस हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले को दोबारा उच्च न्यायालय भेजना अब व्यर्थ होगा। साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिए गए हैं कि दोषी को सजा में राहत से जुड़ा उचित आवेदन तैयार करने में कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। इस फैसले को न्यायिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। सुबोध/०८-०५-२०२६