लेख
12-May-2026
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भारत में जब भी अर्थव्यवस्था पर चर्चा होती है, सरकार और नीति निर्धारकों की ओर से एक बात बार-बार कही जाती है—देश को सोने की खपत कम करनी चाहिए। तर्क दिया जाता है कि सोने का अत्यधिक आयात विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है, चालू खाता घाटा बढ़ाता है और निवेश को “उत्पादक क्षेत्रों” से हटाकर निष्क्रिय संपत्ति में बदल देता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत में सोना वास्तव में केवल एक “डेड एसेट” है? या फिर यह करोड़ों गरीब, मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक जीवनरेखा बन चुका है? तथ्य बताते हैं कि भारत में सोने को केवल आभूषण या विलासिता की वस्तु मानना भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करना है। आज भारत हर वर्ष सोने के आयात पर लगभग 70 अरब डॉलर से अधिक खर्च कर रहा है। यह राशि 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। सरकार के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि इतना बड़ा आयात देश की विदेशी मुद्रा पर दबाव डालता है। इसी कारण समय-समय पर सरकार गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाती है, लोगों से सोना न खरीदने की अपील करती है सोवरेन गोल्ड बांड जैसी योजनाओं के माध्यम से भौतिक सोने की मांग कम करने का प्रयास करती है। लेकिन इस आर्थिक दृष्टिकोण की अपनी सीमाएँ हैं। दिल्ली और मुंबई के वातानुकूलित नीति कक्षों से देखने पर सोना “अनुत्पादक निवेश” लग सकता है, परंतु भारत के गांवों, कस्बों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यही सोना सबसे विश्वसनीय बैंक है। भारत में करोड़ों लोगों के पास न पर्याप्त बैंक बैलेंस है, न शेयर बाजार में निवेश की क्षमता और न ही बड़े स्तर की औपचारिक वित्तीय पहुंच। उनके लिए घर में रखा सोना ही संकट के समय की पूंजी है। यही कारण है कि आज गोल्ड लोन भारत की अर्थव्यवस्था का एक विशाल और तेजी से बढ़ता हुआ स्तंभ बन चुका है। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार देश में सक्रिय गोल्ड लोन खातों की संख्या लगभग 9 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। यानी करोड़ों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गोल्ड लोन आधारित आर्थिक गतिविधियों से जुड़े हैं। यह केवल व्यक्तिगत उपभोग का ऋण नहीं है, बल्कि भारत की जमीनी अर्थव्यवस्था की कार्यशील पूंजी का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। छोटे दुकानदार अपनी दुकान चलाने के लिए, किसान बीज और खाद खरीदने के लिए, महिला स्वयं सहायता समूह छोटे व्यवसाय खड़े करने के लिए, और निम्न आय वर्ग के परिवार अचानक बीमारी, शिक्षा या विवाह जैसे खर्चों के लिए घर का सोना गिरवी रखकर तत्काल ऋण प्राप्त करते हैं। कई छोटे व्यापारी तो बैंक की लंबी प्रक्रियाओं और गारंटी की शर्तों से बचने के लिए गोल्ड लोन को ही सबसे तेज और भरोसेमंद वित्तीय विकल्प मानते हैं। यानी जिस सोने को नीति निर्माता “डेड एसेट” कहते हैं, वही जमीन पर करोड़ों लोगों के लिए “जीवंत तरलता” का स्रोत है। भारत की सामाजिक संरचना को समझे बिना सोने की आलोचना अधूरी है। भारतीय परिवारों, विशेषकर महिलाओं के लिए सोना केवल निवेश नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा का माध्यम भी है। विवाह, बीमारी, बेरोजगारी या आकस्मिक संकट की स्थिति में सबसे पहले घर का सोना ही परिवार को संभालता है। ग्रामीण भारत में तो यह अनौपचारिक बैंकिंग व्यवस्था का सबसे भरोसेमंद आधार बन चुका है। विडंबना यह है कि सरकार एक ओर लोगों से सोना न खरीदने की अपील करती है, वहीं दूसरी ओर देश की बैंकिंग और क्रेडिट व्यवस्था आज भी करोड़ों लोगों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाई है। छोटे व्यवसायी को यदि बिना गारंटी का आसान और सस्ता ऋण उपलब्ध नहीं होगा, तो वह स्वाभाविक रूप से अपने घर के सोने पर निर्भर रहेगा। इसलिए समस्या केवल “सोना खरीदने” में नहीं बल्कि वित्तीय समावेशन की अधूरी व्यवस्था में भी है। यह भी सच है कि भारत का विशाल स्वर्ण भंडार अभी भी निष्क्रिय रूप से घरों में पड़ा है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों के पास दुनिया का सबसे बड़ा निजी स्वर्ण भंडार मौजूद है। यदि इस सोने को सुरक्षित वित्तीय प्रणाली से जोड़कर उत्पादक पूंजी में बदला जाए, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी ताकत दे सकता है। लेकिन इसके लिए लोगों का विश्वास जीतना होगा। सरकार की योजनाएँ तब तक सफल नहीं होंगी जब तक आम नागरिक को यह भरोसा न हो कि उसकी संपत्ति सुरक्षित रहेगी और उसे पर्याप्त लाभ मिलेगा। सोने पर बहस को केवल आयात और डॉलर के नजरिए से देखना इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह भारत की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को अनदेखा करता है। भारत में सोना भावनात्मक संपत्ति भी है, सांस्कृतिक प्रतीक भी और आर्थिक सुरक्षा कवच भी। इसलिए समाधान दंडात्मक नीतियों में नहीं बल्कि संतुलित दृष्टिकोण में है। सरकार को चाहिए कि: छोटे व्यापारियों और किसानों के लिए सस्ती औपचारिक क्रेडिट व्यवस्था मजबूत करे, ग्रामीण बैंकिंग पहुंच बढ़ाए, गोल्ड मॉनेटाइजेशन योजनाओं को भरोसेमंद बनाए, और सोने को केवल “समस्या” की तरह देखने की बजाय उसे आर्थिक परिसंपत्ति में बदलने की नीति विकसित करे। क्योंकि भारत में सोना केवल चमकती धातु नहीं है; यह करोड़ों लोगों की आशा, सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व का आधार है। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 12 मई /2026