राज्य
15-May-2026


- हेमंत सरकार की कार्यप्रणाली को बताया कानून की अवहेलना रांची (ईएमएस)। झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में हिरासत में होने वाली मौतों (कस्टोडियल डेथ) और उनकी जांच प्रक्रियाओं को लेकर हेमंत सोरेन सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य की स्थिति को अत्यंत स्तब्धकारी और प्रणालीगत विफलता का उदाहरण करार दिया। न्यायमूर्ति एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार ने हिरासत में हुई मौतों की जांच से संबंधित अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का न केवल व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया है, बल्कि दो दशक पुराने स्पष्ट कानूनों की भी अनदेखी की है। अदालत के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों से यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच झारखंड में कुल 427 लोगों की हिरासत में मौत हुई। कानूनन, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत ऐसी मौतों की जांच अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए। हालांकि, सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि 427 में से 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेटों द्वारा कराई गई। इस पर कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि कार्यपालिका से यह विशेषाधिकार दो दशक पहले ही छीन लिया गया था, फिर भी राज्य सरकार उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है जो कानून की पूर्ण अवहेलना को दर्शाता है। हाई कोर्ट ने इसे राज्य की सत्यनिष्ठा और तत्परता पर गंभीर संदेह पैदा करने वाली स्थिति बताया। पीठ ने कहा कि संसद द्वारा विशेष रूप से अधिनियमित प्रक्रियाओं का पालन न करना यह दर्शाता है कि राज्य सरकार हिरासत में हुई मौतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने में पूरी तरह विफल रही है। अदालत ने इसे प्रणालीगत गैर-अनुपालन की एक बेहद दुखद तस्वीर बताते हुए सरकार की जमकर किरकिरी की। यह टिप्पणी राज्य प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ा करती है और संकेत देती है कि भविष्य में सरकार को इन जांचों की पारदर्शिता और वैधानिकता सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। फिलहाल, हाई कोर्ट के इस कड़े रुख से सत्ता गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। रामयश/ईएमएस 15 मई 2026