नई दिल्ली (ईएमएस)। भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी ) ने अस्वीकार्य बताते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करने की बात कही है। बोर्ड ने कहा है कि फैसला ऐतिहासिक तथ्यों, सरकारी रिकॉर्ड, पुरातात्विक साक्ष्यों और एएसआई के पुराने रुख के खिलाफ दिया गया है। पर्सनल लॉ बोर्ड ने कमाल मौला मस्जिद कमेटी को कानूनी लड़ाई में हर संभव मदद की बात कही है। बोर्ड के प्रवक्ता डॉ। सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड को नजरअंदाज किया है। बोर्ड का कहना है कि ये फैसला प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 की भावना और संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है। डॉ। इलियास ने कहा मध्यकालीन इस्लामी ढांचों में पुराने निर्माण सामग्री का इस्तेमाल आम बात है केवल स्तंभों या नक्काशियों की मौजूदगी से मस्जिद का धार्मिक स्वरूप खत्म नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने संवैधानिक सिद्धांतों और सदियों पुराने धार्मिक इस्तेमाल को नजरअंदाज किया। बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस स्थल के साझा धार्मिक चरित्र को स्वीकार किया था। दशकों तक, एएसआई के आधिकारिक रिकॉर्ड और साइनबोर्ड ने स्थल को भोजशाला / कमाल मौला मस्जिद के रूप में वर्णित किया, जो इसकी विवादित और साझा धार्मिक स्थिति की आधिकारिक मान्यता थी। इसके अलावा, 2003 की प्रशासनिक व्यवस्था के तहत, हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने की अनुमति दी गई, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा अफसोस की बात है कि न्यायालय इस मामले में प्रामाणिक ऐतिहासिक और आधिकारिक अभिलेखों को उचित महत्व देने में विफल रहा। बता दें कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने शुक्रवार (15 मई) को अपने फैसले में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर के रूप में निर्धारित की थी। हाईकोर्ट ने 242 पन्नों के फैसले में एएसआई के सात अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/17/ मई/2026