राज्य
18-May-2026


- विधायक जयवर्धन सिंह के लगातार घटते वोट बैंक से चिंतित दिग्विजय सिंह की रणनीति भोपाल (ईएमएस)। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हमेशा से ही राजनीतिक विवादों में रहे हैं, खासकर उनके मुस्लिम तुष्टीकरण वाले बयानों को लेकर। लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियों और परिवार की राजनीतिक विरासत की चुनौतियों ने उन्हें अपनी रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर कर दिया है। हाल ही में दिग्विजय सिंह ने अपने बेटे और राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के तीन बार के विधायक जयवर्धन सिंह के जनाधार को मजबूत करने के लिए सनातनी परंपराओं और धार्मिक आयोजनों की ओर रुख किया है। दिग्विजय सिंह ने सोमवार से 28 मई तक राघौगढ़ के ग्राम भैंसाना में भव्य 151 कुंडीय श्रीराम महायज्ञ का आयोजन किया है। इस आयोजन का औपचारिक उद्देश्य विश्व कल्याण, आध्यात्मिक शांति और पर्यावरण शुद्धि है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका असली मकसद स्थानीय हिंदू मतदाताओं के बीच राघौगढ़ परिवार की पकड़ को मजबूत करना और जयवर्धन सिंह के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित बनाना है। इस धार्मिक महायज्ञ में केवल धार्मिक क्रियाकलाप ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रम भी शामिल हैं। प्रसिद्ध अभिनेता आशुतोष राणा को आमंत्रित किया गया है ताकि वे धर्ममय संबोधन दें और शिवतांडव स्तोत्र का हिंदी भावानुवाद प्रस्तुत करें। इसके अलावा, प्रख्यात कवि और रामकथा वाचक कुमार विश्वास को भी महायज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है। आयोजकों का मानना है कि इन हस्तियों की उपस्थिति धार्मिक कार्यक्रम को न केवल भव्य बनाएगी, बल्कि जयवर्धन सिंह के राजनीतिक जनाधार को भी मजबूती प्रदान करेगी। गौरतलब है कि राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र हमेशा से ही कांग्रेस के लिए एक मजबूत किला माना जाता रहा है। लेकिन पिछले चुनावों में घटते हुए जीत के मार्जिन ने यह दिखा दिया कि अब इस क्षेत्र में कांग्रेस को निरंतर अपने जनाधार को बनाए रखने के लिए अधिक सक्रिय रणनीति अपनानी होगी। दिग्विजय सिंह और जयवर्धन सिंह की नई रणनीति—धार्मिक आयोजनों और सनातनी छवि के माध्यम से—कहा जा रहा है कि यह उनके लिए आवश्यक डैमेज कंट्रोल का हिस्सा है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि महायज्ञ और धर्म-संस्कृति के माध्यम से जनता के साथ उनकी पहचान मजबूत होती है, तो यह अगले चुनाव में जयवर्धन सिंह के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं, यदि यह प्रयास असफल रहता है, तो भाजपा का तुष्टिकरण और सांप्रदायिक विभाजन का नैरेटिव कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण बना रहेगा। राजनीतिक पृष्ठभूमि और चुनौती जयवर्धन सिंह का राजनीतिक करियर राघौगढ़ में मजबूत माना जाता रहा है, लेकिन हाल के विधानसभा चुनावों ने यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बना दी है। 2013 में जब वे पहली बार चुनाव लड़े थे, तो उन्हें 58,204 वोटों की भारी जीत मिली थी। 2018 में भी उन्होंने 46,697 वोटों से जीत दर्ज की। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में उनके और उनके प्रतिद्वंद्वी के बीच का अंतर केवल 4,505 वोट रह गया। यह उनके राजनीतिक करियर में अब तक का सबसे कम जीत का अंतर था। विश्लेषकों के अनुसार, इस बार हार-जीत के अंतर में कमी का प्रमुख कारण भाजपा द्वारा राघौगढ़ राजघराना और दिग्विजय सिंह की मुस्लिम परस्त छवि को चुनावी मुद्दा बनाना था। भाजपा ने यह प्रचार फैलाया कि राघौगढ़ राजघराना तुष्टिकरण की राजनीति करता है, और इसका असर स्थानीय ग्रामीण और शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच देखा गया। कई मतदाता इस वजह से कांग्रेस से छिटक कर भाजपा की ओर चले गए। नये राजनीतिक रणनीति के संकेत इस चुनावी नतीजे ने जयवर्धन सिंह और उनके पिता दिग्विजय सिंह को यह एहसास दिलाया कि अब राघौगढ़ में अपने जनाधार को बनाए रखने के लिए उन्हें नई रणनीति अपनानी होगी। इसके तहत उन्होंने हिंदू धार्मिक परंपराओं और महायज्ञ जैसे आयोजनों के माध्यम से अपनी सनातनी छवि को जनता के बीच पुन: स्थापित करने का काम शुरू किया है। जयवर्धन सिंह का हाल में बागेश्वर धाम की हिंदू एकता यात्रा में शामिल होना भी इसी रणनीति का हिस्सा था। यह यात्रा स्थानीय हिंदू मतदाताओं के बीच यह संदेश देने के लिए थी कि वे अपने परिवार और राजनीतिक विरासत के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के भी समर्थक हैं। दिग्विजय सिंह की सनातनी छवि दिग्विजय सिंह ने भी खुद को सनातनी परंपराओं के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। इंदौर में हाल ही में भाजपा नेता उषा ठाकुर के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने खुलकर कहा कि वे हमेशा से सनातन धर्म को मानते आए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनके इस जोर देने के बाद ही कई भाजपा नेताओं ने हिंदू शब्द छोडक़र सनातन शब्द का प्रयोग शुरू किया। अपने सनातनी धर्म के प्रमाण के तौर पर दिग्विजय सिंह अक्सर कठिन नर्मदा परिक्रमा और नियमित एकादशी उपवास का हवाला देते हैं। इससे पहले उनकी भगवा आतंकवाद या विवादित बयानों के कारण उन पर हिंदू विरोधी होने के आरोप लगते रहे हैं। इस नैरेटिव को बदलने के लिए अब वे खुले तौर पर अपनी सनातनी पहचान को सामने ला रहे हैं। अयोध्या यात्रा और रामलला दर्शन मार्च 2026 में दिग्विजय सिंह ने अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन किए। यह कदम भी उनकी नई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। रामलला दर्शन और महायज्ञ जैसे आयोजन सीधे तौर पर स्थानीय जनता को यह संदेश देते हैं कि राघौगढ़ राजघराना पूरी तरह सनातन परंपराओं और धार्मिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है। विनोद / 18 मई 26