राष्ट्रीय
19-May-2026
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जहांगीर खान के हटने से बीजेपी की राह हुई आसान कोलकाता,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आते ही एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। चुनावी धांधली के आरोपों के बाद फलता विधानसभा सीट पर होने वाले पुनर्मतदान से ठीक पहले, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार और भतीजे अभिषेक बनर्जी के करीबी जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द करने के बाद अब 21 मई को फिर मतदान होगा। इस बीच, प्रचार थमने से कुछ समय पहले मंगलवार दोपहर को जहांगीर ने बड़ा ऐलान किया कि वह अब चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं ले रहे है। उनके फैसले से फलता सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार देवांग्शु पांडा की सियासी राहें आसान हुई हैं, हालांकि अंतिम हार-जीत का फैसला 21 मई को होने वाले पुनर्मतदान से ही तय होगा। यह कदम तब आया है जब फलता सीट, जो बीते 15 सालों से टीएमसी का मजबूत गढ़ मानी जाती थी, अब एक नए राजनीतिक समीकरण का सामना कर रही है। जहांगीर के इस अप्रत्याशित फैसले के पीछे पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन को मुख्य वजह बताया जा रहा है। 4 मई को आए नतीजों में ममता बनर्जी की सरकार की विदाई और बीजेपी के सत्ता में आने से फलता का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया। इन नई राजनीतिक परिस्थितियों ने जहांगीर के लिए भारी मुश्किलें खड़ी हुई थीं। हालांकि जहांगीर के चुनाव लड़ने से पीछे हटने के बावजूद 21 मई को पुनर्मतदान में किसी तरह का बदलाव नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि मैदान में सीपीएम से शंभू कुर्मी और कांग्रेस से अब्दुर रज्जाक जैसे अन्य उम्मीदवार भी मौजूद हैं। इसलिए, खान के हटने से बीजेपी को बढ़त मिलेगी, लेकिन मुकाबला अभी भी पूरी तरह एकतरफा नहीं होगा। सत्ता बदलते ही फलता का सियासी खेल पूरी तरह बदल चुका है। बीजेपी सरकार बनने के बाद खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने फलता सीट की कमान अपने हाथों में ले ली थी। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार देवांशु पांडा के समर्थन में बड़ी रैली की और जहांगीर पर सीधा हमला बोला। शुभेंदु अधिकारी ने सरेआम जहांगीर को चेतावनी देकर कहा था कि वह खुद को पुष्पा कहता है, अब इस पुष्पा की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है। उन्होंने फलता के लोगों से बीते 10 साल के डर को भुलाकर बेखौफ होकर मतदान करने और बीजेपी को एक लाख से अधिक वोटों से जिताने का आह्वान किया था। इन बदली हुई परिस्थितियों में, 21 मई का पुनर्मतदान अब महज एक औपचारिकता से कहीं अधिक, फलता के बदले हुए सियासी मिजाज का पैमाना साबित होगा। आशीष दुबे / 19 मई 2026