लेख
23-May-2026
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भरी दोपहर चिलचिलाती धूप में शहर के एक प्रसिद्ध चौक पर मैने एक मानसिक रोगी को फटेहाल,आग सी तपती सीमेंटेड रोड पर,नंगे पाँव,बेतहाशा चिल्लाते व इधर से उधर अकारण दौड़ते-भागते देखा, हृदय मानसिक संताप व पीड़ा से व्यथित हो उठा । प्रायःशहरों,कस्बों,ग्रामों की सड़कों पर,गलियों में,चौराहों पर, चौपालों पर,मोहल्लों में,बाजारों में,बस अड्डों पर,रेल्वे स्टेशनों पर,रेल गाड़ियों में कई मानसिक रोगियों ( स्त्री एवं पुरुष दोनों ) को भटकते हुए देखा जाता है । इनमें से अधिकांश परित्यक्त, बेघर,बेसहारा,अज्ञात ही होते हैं। इनका कोई पता ठिकाना तो होता नहीं है। अत्यंत दुर्दशा में ये बदहाल,फटेहाल,मैले कुचैले,फटे चीथड़े गिचपचे कपड़ों में,महीनों गिनती से बगैर नहाये धोए,सिरों में बालों की लटे लिये,कचरो के ढेर से बिना किसी मकसद के कंधे पर रखे थैले में कुछ तो भी भरते हुए पाये जाते हैं । ये असहाय,बेबस - गुरबत में रोते रहते है,कुछ कचरे में सोते मिलते हैं। बदहोशी के मंजर में अकारण चिल्लाते चीखते,गाली गलौज करते या अनाप शनाप कहते रहते हैं । 45 डिग्री तापमान की भीषण गर्मी में इन्हें भूख प्यास भी नहीं लगती ! इनकी दुर्दशा देख अनायास ही नेत्र अश्रुपूरित हो जाते हैं । कमोबेश इनकी यही स्थिती जाड़ों एवं बर्षा ऋतु में भी होती हैं किन्तु स्थानीय प्रशासन, पुलिस,समाज कल्याण विभाग व शासन के प्रतिनिधि गण इनके प्रति संवेदन शून्य हो गए है । उन्हें इनके पुनर्वास के दायित्व का अहसास ही नहीं है। इस बहुकोणीय उपेक्षा के कारण इन निरीह बेसहारा लोगों के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं । प्रशासनिक एवम् वैधानिक दृष्टिकोण से इनके उपचार व पुनर्वास का आधिकारिक कर्तव्य स्थानीय प्रशासन,पुलिस एवं समाज कल्याण विभाग का है। शासन द्वारा मानसिक रोगियों के संरक्षण,उपचार एवं पुनर्वास हेतु समय समय पर अनेकों योजनायें व कानून बनाये गये हैं किंतु उत्तरदायी घोर निद्रा में मग्न है । वे इन लाचारों व इनकी सुरक्षा या उपचार के प्रति दायित्व विहीन हो गए हैं । बौद्धिक दिव्यांगता निवारण हेतु वर्तमान में केन्द्र व म.प्र. शासन द्वारा मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के अधिकारों, सुरक्षा एवं पुनर्वास हेतु दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 प्रभाव में लाया गया है। केंद्र सरकार द्वारा प्रचलित मानसिक स्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम 2017 नवीनतम अधिनियम है । इसमें अपराधिक,अनअपराधिक सभी मानसिक रोगियों के लिए उचित पुनर्वास एवं उपचार के प्रावधान है । अपराधिक विकृत व्यक्तियों के उपचार नियम 2000,लागू होने के विगत 26 वर्षों से इन नियमों का पालन हो रहा है,ऐसा प्रतीत नहीं होता । मध्य प्रदेश शासन द्वारा मानसिक दिव्यांग जनों के पुनर्वास एवं सशक्तिकरण हेतु सीहोर में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की स्थापना की गई है । इसके अतिरिक्त वर्षों से ग्वालियर में तथा बाणगंगा,इंदौर में शासकीय उपचारगृहों में समुचित व्यवस्था है । भोपाल और इंदौर में भी प्राइवेट न्यूरो साइकाइट्रिक हॉस्पिटल एवं रिहैबिलिटेशन सेंटर है किंतु बहुत महंगे है । ग्वालियर,इंदौर एवं सीहोर के संस्थानों में ऐसे रुग्ण लोगों को भर्ती करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है । सर्वप्रथम मेडिकल परीक्षण करवाने हेतु कुछ आवश्यक प्रपत्र प्रस्तुत करना,पुलिस के माध्यम से अथवा सीधे कार्यपालिक दंडाधिकारी के समक्ष रोगी को प्रस्तुत कर उनसे स्थानीय चिकित्सालय हेतु उचित निर्देश प्राप्त करना होता है । स्थानीय चिकित्सालय द्वारा रोगी के परीक्षण उपरान्त रेफर करने पर ही ग्वालियर अथवा इंदौर बाणगंगा के उपचार केंद्रों में रोगियों को भर्ती कराये जाने का प्रावधान है । यह प्रक्रिया पुलिस की प्राथमिकता,कार्यपालिक दंडाधिकारी की समय पर अनुपलब्धता,डॉक्टर्स की मंशा के चलते एवम् अन्य कतिपय कारणों सेअत्यंत कठिन है । समाज कल्याण विभाग तो अत्यंत दायित्वहीन है,मुझे तो अपने 38 वर्ष के मैदानी कार्यकाल में इस विभाग की इस दिशा में किसी गतिविधि को देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। मैंने थाना प्रभारी बेलबाग, जबलपुर की पदस्थापना अवधि में श्री मकरंद देउस्कर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की सहृदयता, संवेदनशीलता व उदारता के चलते लगभग 105 मानसिक विकृत व्यक्तियों ( स्त्री,पुरुष ) को सामूहिक रूप से अपने सहयोगी पुलिसकर्मियों की सहायता से एकत्रित कर उन्हें यथोचित सम्मानपूर्वक, उनकी प्रतिष्ठा व निजता को दृष्टिगत रखते हुए सावधानीपूर्वक उचित सहयोग से साफ सुथरा करवाकर उपयुक्त वस्त्र धारण कराने उपरांत उपरोक्त प्रक्रिया को पूर्ण करते हुए पुलिस बस से ग्वालियर तथा इंदौर के उपचार केंद्रों में भर्ती करवाया था। मेरा व्यक्तिगत सुखद अनुभव है कि ऐसी कार्यवाही करने से समाज से प्रशंसा तो प्राप्त होती ही है साथ ही स्वयं को अतुलनीय आत्मसंतोष प्राप्त होता है। इतने वर्षों के अंतराल उपरांत आज भी यदा कदा उन 105 व्यक्तियों के कोई रिश्तेदार जिन्हें मैं जानता पहचानता नहीं अनायास मिलकर उस कार्य की प्रशंसा करते हैं तो मन प्रफ्फुलित हो जाता है और संपादित कर्तव्य पर गर्व होता है । तत्समय भारतीय पागलपन अधिनियम 1851 प्रभावशील औपनिवेशिक काल से आधुनिक समय तक इस कानून में कई परिवर्तन हुये । पागलपन निवारण अधिनियम 1851,पागलपन एवं भारतीय पागलपन प्रबंधन एवं शरणालय अधिनियम 1858 एवं भारतीय पागलपन अधिनियम 1912 लागू हुये । इन कानूनों में उपचार तथा पुनर्वास की समुचित व्यवस्था तो थी किंतु इसमें मरीजों को समाज से अलग थलग रखा जाता था तथा अपराधिक तथा अनापराधिक रोगियों के साथ एक सा व्यवहार किया जाता था । सन 1987 में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम प्रभाव में आया और पागल जैसे अपमानजनक शब्द को हटाकर मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति शब्द का प्रयोग किया गया । इस अधिनियम में मरीजों के मानवाधिकार एवं उनकी गरिमा पर बल दिया गया । मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2012 वस्तुतः 1987 के उक्त अधिनियम का ही सबसे आधुनिक स्वरूप है । जिसमें बीमारी की स्थिति में आत्महत्या का प्रयास,अपराध की श्रेणी से बाहर रखा गया है एवम् मानसिक रोगी व्यक्तियों को उपचाररत अवस्था में समूह से पृथक रखने का प्रतिबंध निरस्त किया गया है । आलोचना,निंदा,प्रतिनिन्दा एवम् कर्तव्य की विभिन्न चुनौतियों के परे,तमाम व्यस्थताआँ के चलते भी पुलिस का एक ध्येय इन रोगियों के पुनर्वास का पुनीत कार्य करना भी होना चाहिये । सुलभ प्रावधान है कि कोई भी सामान्य व्यक्ति इस संदर्भ में 112 नंबर पर पुलिस को सूचित करें अथवा पुलिस स्वतः संज्ञान ले और इन रोगियों को प्रक्रिया पूर्ण कर उचित चिकित्सालय में भर्ती करवायें। मानसिक रोगी व्यक्ति के भी आम नागरिकों की भांति सभी संवैधानिक अधिकार सुरक्षित हैं। उन्हें भी सम्मान एवं गुणवत्तापूर्ण उपचार कराने, अपनी गोपनीयता बनाए रखने, समुदाय में रहने,निर्णय लेने, निशुल्क कानूनी सहायता एवं शोषण से सुरक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार हैं। मानसिक रोगियों को प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण अधिकारों मे बिना उनकी अनुमति अथवा सहमति के उन पर कोई भी इलेक्ट्रॉनिक थेरेपी या नसबंदी जैसा उपचार नहीं किया जा सकता,उल्लेखनीय है । उन्हें अपने व्यक्तिगत सामान, धन के प्रबंधन,बाहरी लोगों, परिवार जनों,मित्रों,वकीलों से मिलने या फोन पर बात करने का पूरा अधिकार प्राप्त है l उपसंहार है कि इनकी सुरक्षा,उपचार तथा पुनर्वास हम सभी का दायित्व है । दावा यह नहीं है कि ऐसे रोगी आक्रामक या हिंसक नहीं होते । अतः इनकी सहायता करते समय पर्याप्त सुरक्षात्मक सावधानी भी वांछित है । अपील है कि इनके प्रति सहानुभूति एवम् संवेदना रखें, तथा इन्हें पागल अथवा विक्षिप्त या विकृतचित्त जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित न करें । क्योंकि ये भी.... उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। समाज पर मानसिक स्वास्थ्य रोगियों को लेकर लगे उपेक्षा एवम् अकर्मण्यता के कलंक को मिटाने हेतु इनके उपचार हेतु प्रयास करके उनके बेहतर भविष्य और पुनर्वास में अपना सहयोग देना होगा । यह भी देशभक्ति का ही एक स्वरूप है एवम् एक पुनीत व पवित्र कार्य भी है। मिटे जो प्यार के लिये वो ज़िन्दगी, जले बहार के लिये वो ज़िन्दगी किसी को हो न हो हमें तो ऐतबार... जीना इसी का नाम है । (राज्य पुलिस सेवा नगर पुलिस अधीक्षक ( से.नि.)) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 23 मई /2026