लेख
23-May-2026
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अब दुनिया को एक और वायरस चुनौती देने के लिए दस्तक दे रहा है दुनिया को कोरोना महामारी के दौरान यह सबक मिला कि कोई भी वायरस केवल किसी एक देश या महाद्वीप की समस्या नहीं होता। आज अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में इबोला वायरस के बढ़ते मामलों ने मामलों ने फिर यह याद दिलाया है कि स्वास्थ्य सुरक्षा अब सीमाओं में बंधी हुई चीज नहीं रही। जहां भी बीमारी फैलती है, उसका प्रभाव पूरी दुनिया की चिंता चन जाता है। ताजा रिपोटों के अनुसार, इस प्रकोप में सैकड़ों संदिग्ध मामले और बड़ी संख्या में संदिग्ध मौतें सामने आई हैं, जबकि भारत में भी प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों के लिए सतर्कता संबंधी सलाह जारी की गई है। यह कितना तेज से फैल रहा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। पूर्वी कांगो में इबोला वायरस के दुर्लभ सुंडीबुग्यो स्ट्रेन के प्रकोप के कारण 139 लोगों की मौत हो गई है और 500 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए हैं। भारत ने इसको लेकर काफी सर्तक है। इबोला वायरस से बढ़ते प्रकोप को देखते हुए भारत और अफ्रीकी संघ के बीच होने वाले शिखर सम्मलेन को रद कर दिया गया। यह आयोजन 28 मई को नई दिल्ली में होना था। साथ ही भारत सरकार की तरफ से सर्तकता जारी की गयी है। इबोला कोई सामान्य बीमारी नहीं है। इबोला वायरस एक अत्यंत संक्रामक और घातक वायरल हेमोरेजिक बुखार है जो रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है। इसके प्रकोप में मृत्यु दर 25% से लेकर 90% तक होती है। वर्तमान में, कांगो और अफ्रीकी क्षेत्रों में इसके बढ़ते मामलों के कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इसे लेकर वैश्विक अलर्ट जारी किया गया है।इबोला के मुख्य लक्षणवायरस के संपर्क में आने के 2 से 21 दिनों (औसत 8-10 दिन) के भीतर लक्षण दिखाई देने लगते हैं :शुरुआती लक्षण: तेज बुखार, अत्यधिक थकान, गले में खराश, सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द।गंभीर लक्षण: गंभीर उल्टी, दस्त, पेट में दर्द, और त्वचा पर चकत्ते।अंतिम चरण: आंतरिक और बाहरी दोनों तरफ से बिना कारण खून बहना, और अंगों का काम बंद कर देना (मल्टी-ऑर्गन फेलियर)यह संक्रमित व्यक्ति के खून, शरीर के तरल पदार्थों या संक्रमित जानवरों के संपर्क से फैल सकता है। बुखार, कमजोरी, उल्टी, दस्त, सिरदर्द और असामान्य रक्तस्राव जैसे लक्षण इसके खतरे की चेतावनी हो सकते हैं। इसलिए ऐसे किसी भी व्यक्ति को, जिसने हाल में प्रभावित क्षेत्र की यात्रा की हो, लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और अपनी यात्रा का पूरा विवरण स्वास्थ्य अधिकारियों को बताना चाहिए। इस बार चिंता इसलिए भी अधिक है क्योंकि प्रकोप बुडिबुग्यो स्ट्रेन से जुड़ा बताया जा रहा है। इस स्ट्रेन के लिए अभी व्यापक रूप से उपलब्ध प्रमाणित वैक्सीन की स्थिति सीमित है, और विशेषज्ञों के अनुसार वैक्सीन विकसित करने में समय लग सकता है। यही कारण है कि रोकथाम, जांच, आइसोलेशन और संपर्क में आए लोगों की पहचान सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन जाते हैं। अफ्रीका के जिन इलाकों में यह बीमारी फैल रही है, वे पहले से ही हिंसा, विस्थापन और कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जब लोग अपने घर छोड़कर इधर-उधर जाते हैं, अस्पतालों में संसाधन कम होते हैं और स्वास्थ्यकर्मियों के पास पर्याप्त सुरक्षा साधन नहीं होते, तब वायरस को रोकना और कठिन हो जाता है। रिपोर्टों में स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों ने दवाओं, मास्क और संपर्क तलाशने के साधनों की कमी जैसी गंभीर समस्याएं भी उठाई हैं। भारत के लिए फिलहाल घबराने की नहीं, बल्कि पूरी सतर्कता की जरूरत है। देश में अब तक इबोला का कोई मामला सामने आने की सूचना नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय यात्रा के इस दौर में निगरानी को मजबूत रखना आवश्यक है। हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग, संदिग्ध यात्रियों की पहचान, क्वारंटाइन व्यवस्था, प्रयोगशाला जांच और अस्पतालों की तैयारी केवल कागजी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि जमीन पर पूरी मजबूती से लागू होनी चाहिए। सबसे बड़ी जरूरत है कि जनता को सही जानकारी मिले। महामारी के समय अफवाहें भी जंगल की आग की तरह फैलती हैं। कोरोना काल में हमने देखा था कि डर, गलत सूचना और लापरवाही यानि तीनों मिलकर संकट को और बढ़ा देते हैं। इसलिए इबोला को लेकर भी न तो दहशत फैलानी चाहिए और न ही इसे हल्के में लेना चाहिए। सही संदेश यही है कि बीमारी गंभीर है, लेकिन समय पर पहचान, अलगाव और उपचार से संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सकता है। सरकारों की जिम्मेदारी केवल एडवाइजरी जारी करने तक सीमित नहीं हो सकती। जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, सीमा क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण देना होगा। पीपीई, आइसोलेशन वार्ड, एंबुलेंस व्यवस्था और लैब परीक्षण की तैयारी पहले से सुनिश्चित करनी होगी। यदि कोई संदिग्ध मामला मिले, तो घबराहट के बजाय तेज और संगठित कार्रवाई होनी चाहिए। इस संकट ने फिर सावित किया है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश किसी खर्च का नाम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है। मजबूत अस्पताल, प्रशिक्षित डॉक्टर नर्स, पारदशर्शी सूचना व्यवस्था और वैज्ञानिक सोच ये किसी भी देश को महामारी से बचाने की पहली दीवार हैं। कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था केवल गरीब देशों की समस्या नहीं रहती, क्योंकि बीमारी की कोई सीमा नहीं होती। आज दुनिया को अफ्रीका के प्रभावित क्षेत्रों के साथ खड़ा होना चाहिए। दवा, उपकरण, विशेषज्ञ, धन और तकनीकी सहायता समय पर पहुंचनी चाहिए। किसी महामारी को रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उसे वहीं नियंत्रित किया जाए जहां वह शुरू हुई है। यदि दुनिया देर करती है, तो उसकी कीमत बाद में कहीं अधिक चुकानी पड़ती है। इबोला का खतरा हमें डराने नहीं, जगाने आया है। कोरोना ने हमें सिखाया था कि देर से चेतना महंगी पड़ती है। अब जरूरी है कि हम पिछले अनुभवों से सीखें। सरकारें सजग रहें, स्वास्थ्य तंत्र तैयार रहे और नागरिक जिम्मेदारी निभाएं। बीमारी से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जाती, वह जागरूक समाज, वैज्ञानिक सोच और सामूहिक अनुशासन से जीती जाती है। इसलिए आज संदेश साफ है कि इबोला से डरने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत है। समय पर जांच, सही सूचना, यात्रा इतिहास की ईमानदार जानकारी और स्वास्थ्य निर्देशों का पालन ही इस खतरे को सीमित कर सकता है। दुनिया ने कोरोना को झेला है, उससे सीखा भी है। अब वही सीख इबोला जैसे खतरनाक वायरस के सामने हमारी सबसे बड़ी ताकत बननी चाहिए। इबोला जानलेवा हो सकता है, लेकिन अजेय नहीं है। इतिहास गवाह है कि मजबूत निगरानी, तेज कार्रवाई और समुदाय के सहयोग से इबोला के प्रकोपों को रोका गया है। इस बार भी दुनिया को घबराने के बजाय एकजुट होकर काम करना होगा। भारत को भी सतर्क रहना होगा, लेकिन डर का माहौल नहीं बनाना होगा। नागरिकों को अफवाहों से बचना चाहिए, सरकार को तैयारी मजबूत रखनी चाहिए और मीडिया को जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि हम कोरोना के अनुभव से सीखें और हर नए वायरस को केवल खतरा नहीं, बल्कि तैयारी की परीक्षा मानें। मानवता ने पहले भी महामारियों का सामना किया है और आगे भी करेगी। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हमें देर नहीं करनी है। आपको बता दें कि यह बीमारी हवा के जरिए नहीं फैलती, बल्कि निम्नलिखित माध्यमों से सीधे संपर्क में आने पर होती है :संक्रमित व्यक्ति या मृत शरीर के रक्त और शारीरिक तरल पदार्थों पसीने, लार, उल्टी, वीर्य को छूना।दूषित सुइयों या चिकित्सा उपकरणों का इस्तेमाल।संक्रमित जंगली जानवरों (जैसे चमगादड़ या बंदर) के मांस के सेवन या संपर्क से।बचाव और उपचारइबोला का कोई विशिष्ट इलाज या दवा मौजूद नहीं है, केवल लक्षणों के आधार पर जीवन रक्षक चिकित्सा (जैसे तरल पदार्थ देना) ही एकमात्र तरीका है। इससे बचने के लिए:प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा से बचें।संक्रमित लोगों और उनके संपर्क में आए लोगों से पूरी दूरी बनाए रखें।व्यक्तिगत स्वच्छता और सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करें। जाहिर है कि यह बेहद खतरनाक वायरस है और इस से बचने के लिए पर्याप्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 23 मई 26