राष्ट्रीय
26-May-2026


-सीजेआई के नाम लिखी खुली चिट्ठी नई दिल्ली,(ईएमएस)। देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की एक तीखी टिप्पणी को लेकर देश के कानूनी गलियारों और नागरिक समाज में भारी विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है। पूर्व नौकरशाहों, वकीलों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विभिन्न समूहों ने एक विस्तृत खुली चिट्ठी लिखकर प्रधान न्यायाधीश की उन मौखिक टिप्पणियों की तीखी आलोचना की है, जिसमें उन्होंने तथाकथित पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं द्वारा अदालती याचिकाओं के माध्यम से देश की महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं को रोकने के कथित प्रयासों पर गंभीर सवाल उठाए थे। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के एक पुराने आदेश के खिलाफ दायर विशेष याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में गुजरात के पिपावाव बंदरगाह के विस्तार के लिए दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती दी गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता को एनजीटी के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने की कानूनी छूट देते हुए आंशिक राहत जरूर दी, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालती याचिकाओं के जरिए विकास कार्यों को बाधित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई। पीठ ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा था कि यदि हर बड़ी विकास परियोजना को सीधे अदालत में घसीटा जाएगा, तो देश आगे कैसे प्रगति करेगा। उन्होंने याचिकाकर्ताओं की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा था कि देश में ऐसी एक भी परियोजना नहीं दिखती जिसका इन कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर स्वागत किया हो। इसी टिप्पणी के विरोध में कॉन्स्टिट्यूशन कंडक्ट ग्रुप के 71 पूर्व सिविल सेवकों सहित देश के 600 से अधिक नागरिकों, नागरिक समाज समूहों, 72 वकीलों और कानून के छात्रों ने प्रधान न्यायाधीश को यह खुला पत्र भेजा है।इस संयुक्त पत्र में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी इस हालिया टिप्पणी को तत्काल वापस ले। प्रदर्शनकारी समूहों का तर्क है कि इस तरह की शीर्ष टिप्पणी देश में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकती है और निचली अदालतों के रुख को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है। चिट्ठी में इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया है कि पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाले अधिकांश विशेषज्ञ निकाय केवल सरकारी अधिकारियों से भरे होते हैं, जो अक्सर रबर स्टैंप की तरह काम करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इन मूल्यांकन निकायों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह टिप्पणी उन जागरूक नागरिकों और समुदायों को संदिग्ध श्रेणी में खड़ा करती है, जो दशकों से कानून के दायरे में रहकर देश की पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/26मई 2026