क्षेत्रीय
26-May-2026
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- मौलाना आमिर मियां सफ़वी मिस्बाही के हवाले से जानकारियां फतेहपुर (ईएमएस)। इस्लाम में ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्रिय चीज़ को कुर्बान करने के जज़्बे, सब्र, इखलास और बंदगी का प्रतीक है। कुर्बानी का असली मकसद केवल जानवर जिबह करना नहीं, बल्कि इंसान के दिल में मौजूद घमंड, लालच, स्वार्थ और दुनियावी मोहब्बत को अल्लाह की रज़ा के लिए त्याग देना है। मौलाना आमिर मियां सफ़वी मिस्बाही कहते हैं कि कुर्बानी का सिलसिला इंसानी इतिहास में हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके फरमांबरदार बेटे हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम की यादगार से जुड़ा हुआ है। यह वह वाकया है जिसने पूरी इंसानियत को यह पैगाम दिया कि जब अल्लाह का हुक्म सामने हो तो बंदा अपनी सबसे प्यारी चीज भी कुर्बान करने में पीछे न हटे। मौलाना बताते हैं कि हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ख्वाब में अपने बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का ख्वाब देखा। यह कोई मामूली इम्तेहान नहीं था, बल्कि एक बाप के लिए अपनी आंखों की ठंडक और बुढ़ापे के सहारे को कुर्बान करने की परीक्षा थी। लेकिन उन्होंने अल्लाह के हुक्म के आगे सिर झुका दिया। दूसरी ओर हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम ने भी अपने वालिद से कहा कि “आपको जो हुक्म दिया गया है उसे पूरा कीजिए, इंशाअल्लाह आप मुझे सब्र करने वालों में पाएंगे।” यह मिसाल आज भी बंदगी, इताअत और सब्र का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। मौलाना आमिर मियां सफ़वी मिस्बाही के अनुसार, जब हजरत इब्राहीम अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हुए, तब अल्लाह तआला ने उनकी नीयत और इखलास को कबूल फरमाते हुए हजरत इस्माइल की जगह एक दुम्बा भेज दिया और फरमाया कि यह कुर्बानी कबूल हुई। यही वजह है कि हर साल मुसलमान ईद-उल-अज़हा के मौके पर कुर्बानी करते हैं, ताकि इस अज़ीम सुन्नत को जिंदा रखा जा सके। वे कहते हैं कि आज समाज में कुर्बानी के असल मकसद को समझने की जरूरत है। बहुत से लोग इसे महज रस्म, दिखावा या सामाजिक प्रतिष्ठा का माध्यम बना लेते हैं, जबकि इस्लाम में कुर्बानी की बुनियाद नीयत, तकवा और अल्लाह की रज़ा है। कुरआन शरीफ में साफ तौर पर फरमाया गया है कि अल्लाह तक न जानवर का गोश्त पहुंचता है और न खून, बल्कि उसके पास तुम्हारा तकवा यानी परहेजगारी पहुंचती है। मौलाना सफ़वी मिस्बाही का कहना है कि कुर्बानी हर उस मुसलमान पर वाजिब है जो शरई तौर पर मालदार हो। जिसके पास जरूरत से ज्यादा माल या जेवर हो और वह साहिबे-निसाब हो, उस पर कुर्बानी करना जरूरी है। मर्द और औरत दोनों पर यह हुक्म लागू होता है। अगर किसी महिला के पास इतना जेवर या संपत्ति है जिससे वह मालदार कहलाती है तो उस पर भी कुर्बानी वाजिब होगी। उन्होंने बताया कि कुर्बानी के जानवर का स्वस्थ और शरीयत के मुताबिक होना जरूरी है। जानवर बीमार, लंगड़ा या किसी गंभीर शारीरिक कमी वाला नहीं होना चाहिए। बकरा, भेड़, भैंस और ऊंट आदि के साथ ही हुकूमत एवं सरकारों की मंशा के तहत कुर्बानी शरीयत के दायरे में की जाती है। कुर्बानी का समय ईद की नमाज के बाद शुरू होता है और तय दिनों तक जारी रहता है। मौलाना आमिर मियां सफ़वी मिस्बाही कहते हैं कि कुर्बानी इंसान को त्याग, इंसानियत और सामाजिक बराबरी का संदेश देती है। कुर्बानी का गोश्त गरीबों, जरूरतमंदों और रिश्तेदारों में बांटना इस बात का संकेत है कि समाज में भाईचारा और मदद का जज़्बा कायम रहे। ईद-उल-अज़हा हमें यह सिखाती है कि इंसान अपनी इच्छाओं को अल्लाह की रज़ा के अधीन कर दे और समाज के कमजोर तबके का भी ख्याल रखे। अंत में मौलाना कहते हैं कि कुर्बानी को केवल रस्म न समझा जाए, बल्कि इसके पीछे छिपे संदेश— त्याग, ईमानदारी, सब्र, तकवा और अल्लाह की बंदगी—को अपनी जिंदगी में उतारने की जरूरत है। यही कुर्बानी की असली हकीकत और अहमियत है। शीबू खान/ ईएमएस 26 मई, 2026