राज्य
26-May-2026


भोपाल(ईएमएस)। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, भोपाल इकाई के तत्वावधान में आयोजित व्यंग्य गोष्ठी मूर्धन्य साहित्यकार एवं प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी को समर्पित रही। कार्यक्रम में साहित्यकारों एवं व्यंग्यकारों ने समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विसंगतियों पर तीखे व्यंग्य प्रस्तुत किए। गोष्ठी की अध्यक्षता परिषद की वर्तमान अध्यक्ष और उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि, “व्यंग्य केवल हँसाने की विधा नहीं, बल्कि समाज की विसंगतियों को आईना दिखाने वाली गंभीर साहित्यिक चेतना है। शरद जोशी ने अपने लेखन के माध्यम से आम जनजीवन की विडंबनाओं, राजनीतिक विरोधाभासों और सामाजिक विस्थापन को अत्यंत सहज, तीक्ष्ण और मानवीय दृष्टि से अभिव्यक्त किया। उन्होंने भाषा को जनभाषा बनाया और व्यंग्य को साहित्य की केंद्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया।” मुख्य अतिथि डॉ. कुमार सुरेश ने अपने व्यंग्य पाठ “मेरी हंडिया में लागा चोर” के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने सभी व्यंग्यकारों की प्रस्तुतियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि व्यंग्य समाज को दिशा देने वाली सशक्त विधा है। बीज वक्तव्य देते हुए परिषद की महामंत्री सुनीता यादव ने कहा कि शरद जोशी के व्यंग्य लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी “इम्प्रूवाइजेशन कला” थी। वे किसी साधारण शब्द, स्थिति या घटना से ऐसी असंभव संभावनाएँ निकालते थे कि पाठक उनकी रचनात्मकता में पूरी तरह डूब जाता था। उन्होंने कहा कि पेट्रोल संकट, नेता का ता गुमना और आसनसोल जैसी रचनाएँ उनके अद्भुत व्यंग्य कौशल का उदाहरण हैं। व्यंग्य उनके लिए सांस लेने जितना सहज और आवश्यक था। वे जिन मूल्यों के लिए लिखते थे, उन्हीं मूल्यों पर जीवन भी जीते रहे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ व्यंग्यकार गोकुल सोनी ने किया। सरस्वती वंदना अंशु वर्मा तथा परिषद गीत श्रद्धा यादव ने प्रस्तुत किया। गोष्ठी में विभिन्न रचनाकारों ने अपने व्यंग्य पाठ प्रस्तुत किए। सुदर्शन सोनी ने पढ़ा, “हर नुक्कड़ पर एक पान की व एक दाँत की दुकान है।” विवेक रंजन श्रीवास्तव ने “लेखक का चश्मा” शीर्षक से व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए कहा, “लेखक का चश्मा बौद्धिकता का लाइसेंस है, चश्मा चढ़ाते ही आप युगदृष्टा बन जाते हैं।” अशोक व्यास ने “गधे घोड़ों की सोच से आगे कॉकरोच” शीर्षक से व्यंग्य पाठ किया। अशोक धमेनियाँ ने “तीन बेर खाती थी वो, तीन बेर खाती हैं” रचना प्रस्तुत की। उषा चतुर्वेदी ने “खिचड़ी” व्यंग्य के माध्यम से भोजन परंपराओं पर टिप्पणी की। गौरीशंकर गौरीश ने पढ़ा, “ये मैले हैं, एमएलए हैं, इनकी जेबें नहीं थैले हैं।” सुधा दुबे ने “मुन्नी बदनाम हुई” शीर्षक से व्यंग्य प्रस्तुत किया। प्रतिभा द्विवेदी ने “नीर पी गयी मछलियाँ, मूस चर गये खेत” शीर्षक से व्यंग्य पाठ किया। सुरेश पटवा ने व्यंग्य पढ़ा- साहित्यिक गोष्ठियों की अनाचार संहिता। शारदा दयाल श्रीवास्तव नेता के पत्तों के माध्यम से व्यंग्य रचनापाठ किया। यशवंत गोरे ने पढ़ा। तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हें बीमारी। कार्यक्रम में राजेंद्र शर्मा अक्षर, ऋषिकुमार मिश्र, संजय सक्सेना, महेश सक्सेना, मनोज जैन मधुर, बी.एल. गोहिया, राजकुमार बरुआ, रमेश व्यास शास्त्री तथा शारदा दयाल श्रीवास्तव सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। हरि प्रसाद पाल /26 मई, 2026