:: अन्य धर्म में विवाह करने वाले दंपती की याचिका खारिज, अदालत ने कहा- सुरक्षा व्यवस्था देखना पुलिस का काम, कोर्ट नहीं कर सकती माइक्रो मैनेजमेंट :: इंदौर (ईएमएस)। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने अन्य धर्म में विवाह करने वाले एक दंपती को चौबीसों घंटे पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की है कि केवल सामान्य आशंकाओं या संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर किसी को भी निरंतर व्यक्तिगत सुरक्षा देने के आदेश जारी नहीं किए जा सकते। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने रतलाम शहर में रहने वाले एक दंपती द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश सुनाया। याचिका में दंपती ने अपनी जान को खतरा बताते हुए 24 घंटे पुलिस सुरक्षा और रात के समय विशेष सुरक्षा देने की मांग की थी। :: सुरक्षा के लिए आ रही याचिकाओं पर कोर्ट ने जताई चिंता :: सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस तरह की याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि यह अदालत देख रही है कि लगभग हर अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह के मामलों में याचिकाओं का एक पूरा बंडल आ रहा है, जहां जोड़े बिना किसी स्पष्ट, पुख्ता और अचूक साक्ष्य के निरंतर पुलिस सुरक्षा की मांग करते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था का आकलन करना और उसे संभालना सुरक्षा एजेंसियों का काम है। अदालत इसके तौर-तरीके तय करने के लिए कोई एकमुश्त आदेश (ब्लैंकेट ऑर्डर) जारी नहीं कर सकती और न ही सुरक्षा प्रतिष्ठान की भूमिका खुद अपने हाथों में ले सकती है। :: संदेह के आधार पर नहीं मिल सकते सशस्त्र गार्ड :: हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि असाधारण व्यक्तिगत सुरक्षा की मांग करने वाली हर याचिका के लिए जीवन को वास्तविक और आसन्न खतरा होने का स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए। केवल सामान्य आशंका या किसी संदिग्ध वाहन के दिखने जैसी छिटपुट घटनाओं के आधार पर सशस्त्र गार्ड तैनात नहीं किए जा सकते। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय पुलिस द्वारा नियमित गश्त (पेट्रोलिंग) और जांच की जानी चाहिए, न कि व्यक्तिगत सुरक्षा गार्ड दिए जाएं। :: 2019 में आर्य समाज मंदिर में की थी शादी :: मामले के अनुसार, रतलाम के इस जोड़े ने साल 2019 में दिल्ली के एक आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह किया था। याचिका के मुताबिक, युवती पहले इस्लाम धर्म मानती थी और उसने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म अपनाया था। विवाह और धर्मांतरण की जानकारी जैसे ही युवती के माता-पिता को मिली, उन्हें युवती के परिवार और अन्य लोगों से जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। इसके बाद साल 2022 में यह जोड़ा पहली बार हाई कोर्ट पहुंचा था, जहां अदालत ने रतलाम एसपी को नियमानुसार सुरक्षा देने पर विचार करने के निर्देश दिए थे। :: सुरक्षा हटाने पर दोबारा पहुंचे थे कोर्ट :: मौजूदा याचिका में दंपती ने कोर्ट को बताया कि 13 अप्रैल को बिना किसी प्रशासनिक कारण के उनकी सुरक्षा में तैनात सशस्त्र गार्ड को हटा दिया गया और उसकी जगह होमगार्ड के एक जवान को तैनात कर दिया गया, जिसके पास न तो बंदूक थी और न ही मोबाइल फोन। दंपती ने कार रोकने के प्रयास और घर के आसपास संदिग्ध गाड़ियों के घूमने का हवाला देकर दोबारा पुख्ता सुरक्षा मांगी थी, जिसका राज्य सरकार ने कड़ा विरोध किया। :: कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का संवैधानिक कर्तव्य :: हाई कोर्ट ने अपने पुराने आदेश का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 2022 में रतलाम एसपी को दिए गए निर्देश का मतलब यह कतई नहीं था कि दंपती को स्थायी रूप से 24 घंटे सुरक्षा दी जाए। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि वे पुलिस सुरक्षा के माइक्रो मैनेजमेंट (बारीक प्रबंधन) में दखल नहीं दे सकते। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा करना पुलिस प्रशासन का पूर्ण वैधानिक और संवैधानिक कर्तव्य है। यदि कोई शिकायत मिलती है, तो अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत त्वरित और उचित कदम उठाने होंगे। प्रकाश/27 मई 2026