ज़रा हटके
28-May-2026
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न्यूयॉर्क (ईएमएस)। बायोटेक कंपनी कोलोसल बायोसाइंसेस के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में कृत्रिम माहौल तैयार कर जिंदा चूजों को जन्म देने में सफलता हासिल करने का दावा किया है। वैज्ञानिकों के इस दावे ने सभी को चौका दिया है। वैज्ञानिकों ने इस काम के लिए थ्री-डी प्रिंटेड तकनीक से तैयार किए गए एक खास ढांचे का इस्तेमाल किया, जो बिल्कुल असली अंडे के छिलके की तरह काम करता है। कंपनी का कहना है कि इस अनोखी तकनीक के जरिए अब तक 26 चूजों का जन्म हो चुका है। इनमें कुछ चूजे कुछ दिन के हैं, जबकि कुछ कई महीने तक जीवित रह चुके हैं। कंपनी के अनुसार इस प्रयोग में निषेचित मुर्गी के अंडों को एक विशेष कृत्रिम प्रणाली में रखा गया। इसके बाद पूरे सिस्टम को नियंत्रित तापमान वाले इनक्यूबेटर में सुरक्षित रखा गया। वैज्ञानिकों ने कृत्रिम छिलके के भीतर एक खास झिल्ली लगाई, जो असली अंडे की तरह भ्रूण तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करती है। इसके अलावा चूजों के विकास के लिए अलग से कैल्शियम भी उपलब्ध कराया गया। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक भ्रूण के विकास को वास्तविक समय में देख और समझ पा रहे थे। कोलोसल बायोसाइंसेस लंबे समय से विलुप्त हो चुके जीवों को दोबारा धरती पर लाने की परियोजनाओं पर काम कर रही है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बेन लैम का कहना है कि इस आर्टिफिशियल एग तकनीक का उपयोग भविष्य में न्यूजीलैंड के विलुप्त विशालकाय “साउथ आइलैंड जायंट मोआ” पक्षी को वापस लाने में किया जा सकता है। बताया जाता है कि मोआ पक्षी का अंडा सामान्य मुर्गी के अंडे से करीब 80 गुना बड़ा होता था। वैज्ञानिकों का मानना है कि इतनी बड़ी प्रजाति के लिए प्राकृतिक तरीके से अंडा तैयार करना वर्तमान समय में संभव नहीं है। हालांकि कंपनी के इस दावे पर कई स्वतंत्र वैज्ञानिकों ने सवाल भी उठाए हैं। यूनिवर्सिटी एट बफेलो के इवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट विंसेंट लिंच का कहना है कि वैज्ञानिकों ने केवल कृत्रिम छिलका बनाया है, पूरा अंडा नहीं। उनके अनुसार असली अंडे में कई अस्थायी अंग और जैविक संरचनाएं होती हैं, जो भ्रूण को पोषण देने और अपशिष्ट पदार्थों को हटाने का काम करती हैं। इस कृत्रिम प्रणाली में वे सभी प्राकृतिक प्रक्रियाएं मौजूद नहीं थीं। यूनिवर्सिटी ऑफ शेफिल्ड की वैज्ञानिक निकोला हेमिंग्स ने भी कहा कि कृत्रिम छिलकों के जरिए चूजों का विकास पूरी तरह नई तकनीक नहीं है। इससे पहले भी प्लास्टिक आधारित कृत्रिम संरचनाओं में चूजों को विकसित करने के प्रयोग किए जा चुके हैं। उनका मानना है कि विलुप्त जीवों को वापस लाने की बजाय वैज्ञानिकों को मौजूदा संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इस बीच न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के बायोएथिसिस्ट आर्थर कैपलन ने इस तकनीक से जुड़े नैतिक और पर्यावरणीय सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि वैज्ञानिक किसी विलुप्त जीव को दोबारा बना भी लेते हैं, तो आज के बदले हुए पर्यावरण में उसका जीवित रहना बेहद कठिन होगा। सुदामा/ईएमएस 28 मई 2026