राष्ट्रीय
02-Jun-2026


जलवायु परिवर्तन से गेहूं की फसल पर संकट बढ़ती गर्मी से उत्पादन और गुणवत्ता पर असर नई दिल्ली(ईएमएस)। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है। देश हर साल लगभग 10.7 करोड़ टन गेहूं पैदा करता है और वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है। लेकिन जलवायु परिवर्तन अब इस फसल के लिए धीरे-धीरे एक बड़े संकट का रूप लेता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्टडी करने वाले संगठन क्लाईमेट की नई रिसर्च बताती है कि भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है। सर्दियां छोटी हो रही हैं, रातें गर्म हो रही हैं, फरवरी और मार्च में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और कटाई के समय बेमौसम बारिश किसानों की मेहनत पर पानी फेर रही है। इसके कारण फसल की वृद्धि, दाने बनने की प्रक्रिया और कुल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है जिससे पैदावार में गिरावट देखी जा रही है। यह सिर्फ खेती का संकट नहीं बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा सवाल बनता जा रहा है। भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि उत्पादन वृद्धि की रफ्तार पहले जैसी नहीं रही। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा हरियाणा का है। 1986-95 के दौरान राज्य में गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर 30 प्रतिशत थी। लेकिन 2015-25 के दौरान यह घटकर -2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। पंजाब में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला। यह सिर्फ कृषि उत्पादन का आंकड़ा नहीं है। यह संकेत है कि जिस इलाके ने हरित क्रांति को जन्म दिया और अब वहीं जलवायु परिवर्तन की मार सबसे अधिक महसूस की जा रही है। सबसे बड़ा खतरा- रात की बढ़ती गर्मी जब भी ग्लोबल वार्मिंग की बात होती है तो आमतौर पर लोगों का ध्यान दिन के तापमान पर जाता है। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि गेहूं के लिए असली खतरा रात के बढ़ते तापमान से पैदा हो रहा है। इस स्टडी में पाया गया कि देश के सभी प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान (रात का तापमान) अधिकतम तापमान की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। गुजरात में तो रात का तापमान दिन के मुकाबले लगभग तीन गुना तेज गति से बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी न्यूनतम तापमान में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार गर्म रातों में पौधों की श्वसन प्रक्रिया बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप पौधे अपने कार्बोहाइड्रेट भंडार को दानों के विकास में लगाने के बजाय ऊर्जा खर्च करने में लगा देते हैं। लेकिन जब रातें गर्म हो जाती हैं तो पौधा अधिक श्वसन करता है और अपनी ऊर्जा खर्च कर देता है। नतीजा यह होता है कि दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, उनका वजन घट जाता है और गुणवत्ता प्रभावित होती है। पंजाब-हरियाणा में संकट सबसे ज्यादा हरित क्रांति के केंद्र रहे पंजाब और हरियाणा आज सबसे तेज गर्म हो रहे राज्यों में शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार 1986-95 के दौरान हरियाणा में गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर करीब 30 प्रतिशत थी। लेकिन 2015-25 के बीच यह गिरकर माइनस 2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। पंजाब में भी इसी तरह की गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा बताता है कि केवल तकनीक और सिंचाई के सहारे उत्पादन बढ़ाने का मॉडल अब जलवायु दबाव के सामने कमजोर पड़ रहा है। सर्दियां छोटी हो रही हैं जिससे गेहूं का प्राकृतिक चक्र टूट रहा है। गेहूं एक ऐसी फसल है जिसे ठंडी सर्दियों की जरूरत होती है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अब सर्दियों की अवधि लगातार घट रही है। अध्ययन के मुताबिक फरवरी सबसे तेजी से गर्म होने वाला महीना बन गया है जहां तापमान में प्रति दशक 0.69 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई। मार्च और अप्रैल भी तेजी से गर्म हो रहे हैं। इसका असर सीधे फसल के महत्वपूर्ण चरणों पर पड़ता है। यही वह समय होता है जब गेहूं में फूल आते हैं और दाने भरने की प्रक्रिया चलती है। तापमान बढऩे से यह अवधि छोटी हो जाती है और पौधा समय से पहले पक जाता है। किसानों की भाषा में कहें तो फसल ‘जल’ जाती है। नतीजा यह होता है कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं। विनोद उपाध्याय / 02 जून, 2026