10-Jun-2026
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- जुर्माना न भरने पर 6 महीने से ज्यादा नहीं हो सकती डिफॉल्ट सजा - हाईकोर्ट ने बदला निचली अदालत का आदेश बेंगलुरु (ईएमएस)। चेक बाउंस से जुड़े मामलों को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत दोषी पाए जाने पर यदि कोई व्यक्ति जुर्माना या मुआवजा नहीं चुका पाता है, तो उसे दी जाने वाली डिफॉल्ट सजा (जुर्माना न भरने के बदले मिलने वाली जेल) किसी भी परिस्थिति में 6 महीने से अधिक नहीं हो सकती। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने बेंगलुरु के कारोबारी दिनेश कृपलानी की रिहाई का आदेश देते हुए की। दिसंबर 2017 में दिनेश कृपलानी ने जुपिटर कैपिटल लिमिटेड के साथ 10 करोड़ रुपये का ऋण समझौता किया था, जिसमें से उन्हें 5.9 करोड़ रुपये की राशि दी गई थी। अगस्त 2020 में बकाया कर्ज और ब्याज चुकाने के लिए दिनेश ने 50 लाख, 3.5 करोड़ और 5 करोड़ रुपये के तीन चेक जारी किए, लेकिन ये तीनों चेक एक ही दिन बाउंस हो गए। इसके बाद कंपनी ने साल 2021 में उनके खिलाफ धारा 138 के तहत तीन अलग-अलग केस दर्ज कराए। दिसंबर 2023 में निचली अदालत ने दिनेश को तीनों मामलों में दोषी ठहराते हुए क्रमशः 61.7 लाख रुपये, 4.3 करोड़ रुपये और 6.2 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगाया। साथ ही आदेश दिया कि यदि वे जुर्माना नहीं भरते हैं, तो उन्हें प्रत्येक मामले में तीन-तीन महीने (यानी कुल 9 महीने) की साधारण कैद काटनी होगी। जुर्माना न चुका पाने के कारण दिनेश कृपलानी को जेल भेज दिया गया, जिसके बाद उन्होंने इस डिफॉल्ट सजा के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी याचिका में तर्क दिया गया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 65 (जो अब भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 24 है) के मुताबिक, जुर्माना न भरने पर मिलने वाली अतिरिक्त सजा, मूल अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सजा के एक-चौथाई (1/4) से अधिक नहीं हो सकती। न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने इस कानूनी तर्क को सही ठहराते हुए कहा कि एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के लिए अधिकतम सजा दो वर्ष की कैद है। इस लिहाज से कानूनन डिफॉल्ट सजा छह महीने से अधिक नहीं हो सकती। अदालत ने जोर देकर कहा कि डिफॉल्ट सजा का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अत्यधिक प्रताड़ित या दंडित करना नहीं है, बल्कि यह केवल जुर्माना वसूलने के लिए दबाव बनाने का एक विधिक साधन है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी पूरी तरह साफ कर दिया कि दोषी को जेल से रिहा करने का मतलब यह कतई नहीं है कि वह अपनी वित्तीय देनदारी से मुक्त हो गया है। अदालत ने कहा कि दोषी की रिहाई से शिकायतकर्ता कंपनी या राज्य सरकार का जुर्माना वसूलने का कानूनी अधिकार खत्म नहीं होता है। वे कानून के दायरे में रहकर दिनेश कृपलानी की संपत्ति या अन्य कानूनी तरीकों से अपनी बकाया राशि की वसूली की कार्रवाई जारी रख सकते हैं। कानूनी जानकारों के मुताबिक, हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में चेक बाउंस के सैकड़ों मामलों में डिफॉल्ट सजा की कानूनी सीमा तय करने में नजीर साबित होगा। - ईएमएस 10 जून 2026