लेख
13-Jun-2026
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रावण को श्रीरामकथा में कई पात्रों (व्यक्तियों) ने श्रीराम से वैर न लेने की सलाह दी, उनमें राक्षस मारीच ने भी रावण को बहुत समझाया किन्तु अन्त में इसे स्वर्णमृग बनना ही पड़ा तथा श्रीराम के हाथों से मोक्ष प्राप्त किया। इसी क्रम में मन्दोदरी, विभीषण, कुम्भकर्ण, शुक-सारण और माल्यवान ने तो श्रीराम से संधि करने के लिए भी समझाया था। इन्हीं पात्रों में मन्दोदरी के बाद सीताजी दूसरी नारी पात्र ने भी रावण को श्रीराम से युद्ध न करने हेतु बहुत समझाया किन्तु जो अहंकार के वश अंधा हो जाता है, उसे समझाना अत्यन्त ही कठिन ही नहीं असम्भव हो जाता है। अत: सीताजी के द्वारा उसे श्रीराम के समक्ष नगण्य बताने के बाद भी वह मोहवश अंधा ही बना रहा। उस भयंकर राक्षस रावण की बात सुनकर सीताजी को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने दीन वाणी में बड़े दु:ख के साथ धीरे-धीरे रावण को उत्तर देना आरम्भ किया। उस समय पतिव्रता देवी तपस्विनी सीता दु:ख से भरकर रोती हुई काँप रही थी और अपने पतिदेव का चिन्तन कर रही थी। तृणमन्तरत: कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता। निवर्तय मनो मत्त: स्वजने प्रीयतां मन:।। वाल्मीकि रामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग २१-३ पवित्र मुस्कानवाली विदेहनन्दिनी ने तिनके की ओट करके रावण को इस प्रकार उत्तर दिया- तुम मेरी ओर से अपना मन हटा लो और आत्मीयजनों (अपनी पत्नियों) पर प्रेम करो। जैसे पापाचारी पुरुष सिद्धी की इच्छा नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम मेरी इच्छा करने के योग्य नहीं हो। जो पतिव्रता के लिए निन्दित है, वह न करने योग्य कार्य में मैं कदापि नहीं कर सकती क्योंकि मैंने एक महान कुल में जन्म लिया है और ब्याह करके इस पवित्र कुल में आई हूँ। रावण से ऐसा कहकर यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता ने उसकी ओर अपनी पीठ फेर ली तथा इस प्रकार कहा- रावण! मैं सती और परायी स्त्री हूँ। तुम्हारी भार्या बनने योग्य नहीं हूँ। जो पतिव्रता के लिए निन्दित है, वह न करने योग्य कार्य मैं कदापि नहीं कर सकती क्योंकि मैंने एक महान कुल में जन्म लिया है और ब्याह करके इस पवित्र कुल में आई हूँ। रावण से ऐसा कहकर यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता ने उसकी ओर अपनी पीठ फेर ली तथा इस प्रकार कहा- रावण! मैं सती और परायी स्त्री हूँ। तुम्हारी भार्या बनने योग्य नहीं हूँ। तुम श्रेष्ठ धर्म की ओर दृष्टिपात करो और सत्पुरुषों के व्रत का इच्छी तरह पालन करो। जैसे तुम्हारी स्त्रियाँ तुम से संरक्षण पाती है दूसरों की स्त्रियों की तुम्हें रक्षा करनी चाहिए। तुम अपने को आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्रियों में अनुरक्त रहो। जो अपनी स्त्रियों से संतुष्ट नहीं रहता तथा जिसकी बुद्धि धिक्कार देने योग्य है, उस चपल इन्द्रियों वाले चंचल पुरुष को परायी स्त्रियाँ पराभव को पहुँचा देती है। इसे फजीहत में डाल देती है। क्या यहाँ सत्पुरुष नहीं रहते हैं अथवा रहने पर भी तुम उनका अनुसरण नहीं करते हो? जिससे तुम्हारी बुद्धि ऐसी विपरीत एवं सदाचार शून्य हो गई है अथवा बुद्धिमान पुरुष जो तुम्हारे हित की बात कहते हैं, उसे नि:सार मानकर राक्षसों के विनाश पर तुले रहने के कारण तुम ग्रहण ही नहीं करते हो? अकृतात्मानमासाद्य राजानमयें रतम्। समृद्धानि विनश्यन्ति राष्ट्राणि नगराणिच।। वाल्मीकिरामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग २१-११ जिसका मन अपवित्र तथा सदुपदेश नहीं ग्रहण करने वाला है, ऐसे अन्यायी राजा के हाथ में पड़कर बड़े-बड़े समृद्धशाली राज्य और नगरी नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार यह रत्नराशि से पूर्ण लंकापुरी तुम्हारे हाथ में आ जाने से अब अकेले तुम्हारे ही अपराध से अतिशीघ्र नष्ट हो जाएगी। रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियों को प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस प्रकार तुमने जिन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, वे तुम्हें पापी कहेंगे और बहुत अच्छा हुआ। जो इस आततायी को यह कष्ट प्राप्त हुआ। इतना कहकर हर्ष मनाएंगे। जैसे प्रभा सूर्य से अलग नहीं होती है, उसी प्रकार मैं श्रीरघुनाथजी से अभिन्न हूँ। ऐश्वर्य या धन के द्वारा तुम मुझे लुभा नहीं सकते। जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजी की सम्मानित भुजा पर सिर रखकर अब मैं किसी दूसरे पुरुष की बाँह की तकिया कैसा लगा सकती हूँ। यदि तुम्हें अपने नगर की रक्षा और दारूण बन्धन से बचने की इच्छा हो तो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को अपना मित्र बना लेना चाहिए क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं। विदित: सर्वधर्मज्ञ: शरणागतवत्सल:। तेन मैत्री भवतु ते यदि जीवितु मिच्छसि।। वाल्मीकिरामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग २१-२० भगवान् श्रीराम समस्त धर्मों के ज्ञाता और सुप्रसिद्ध शरणागतवत्सल हैं। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो उनके साथ तुम्हारी मित्रता हो जानी चाहिए। तुम शरणागतवत्सल श्रीराम की शरण लेकर उन्हें प्रसन्न करो और शुद्ध हृदय होकर मुझे उनके पास लौटा दो। तुम्हारे जैसे निशाचर को कदापि हाथ से छूटा हुआ वज्र बिना मारे छोड़ सकता है और काल भी बहुत दिनों तक तुम्हारी उपेक्षा कर सकता है किन्तु क्रोध में भरे हुए श्रीरघुनाथजी कदापि नहीं छोड़ेंगे। इन्द्र के छोड़े हुए वज्र की गड़गड़ाहट के समान तुम श्रीरामचन्द्रजी के धनुष की घोर टंकार सुनोगे। यहां राम और लक्ष्मण के नामों से अंकित और सुन्दर गाँठवाले बाण प्रज्वलित मुख वाले सर्पों के समान शीघ्र ही गिरेंगे जैसे विनतानन्दन गरुड़ सर्पों का संहार करते हैं, उसी प्रकार श्रीराम रूपी महान गरुड़ राक्षस रूपी बड़े-बड़े सर्पों का वेगपूर्वक उच्छिन्न कर डालेंगे। जैसे भगवान विष्णु ने तीन ही पगों द्वारा असुरों से उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी उसी प्रकार मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँ से निकालकर ले जाएंगे। इसमें संशय नहीं है क्योंकि काल तुम्हें पहले ही मार चुका है। वरुण की सभा में छिप कर रहो किन्तु काल का मारा हुआ विशाल वृक्ष जैसे वज्र का आघात लगते ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम दशरथनन्दन श्रीराम के बाणों से मारे जाकर तत्काल प्राणों से हाथ धो बैठोगे, इसमें संशय नहीं है क्योंकि काल तुम्हें पहले से ही मार चुका है। आश्रमं तत्तयो शून्यं प्रविश्य नरसिहयो:। गोचरं गतयोर्भ्रात्रोरपनीता त्वयाधम।। वाल्मीकिरामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग २१-३० नीच निशाचर! तुमने पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण के सूने आश्रम में घुसकर मेरा हरण किया था। वे दोनों उस समय मायामृग मारने के लिए वन में गए हुए थे (नहीं तो तभी तुम्हें इसका फल मिल जाता) श्रीराम और लक्ष्मण की तो गन्ध पाकर भी तुम उनके सामने नहीं ठहर सकते। क्या कुत्ता कभी दो-दो बाघों के सामने भी टिक सकता है। जैसे इन्द्र की दो बाहों के साथ युद्ध छिड़ने पर वृत्रासुर की एक बाँह के लिए संग्राम के बोझ को संभालना असम्भव हो गया, उसी प्रकार समराङ्गण में उन दोनों भाइयों के साथ युद्ध का जुआ उठाए रखना या टिकना तुम्हारे लिए सर्वथा असम्भव है। वे मेरे प्राणनाथ श्रीराम सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ आकर अपने बाणों द्वारा शीघ्र तुम्हारे प्राण हर लेंगे। ठीक उसी तरह जैसे सूर्य घोड़े से जल को उसकी किरणों द्वारा शीघ्र सुखा देते हैं। (मानसश्री, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 13 जून /2026