अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध को लेकर अभी तक 40 बड़े झूठ बोले हैं। हर झूठ के बाद शेयर बाजार में उस झूठ का असर दिखा, लेकिन ईरान के ऊपर इसका कोई असर नहीं हुआ। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शांति के मसीहा बनना चाहते थे। उन्होंने दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद इजराइल और गजा का युद्ध बंद कराने की बात कही थी। उन्होंने रूस और यूक्रेन के बीच समझौता करने की बात कही थी। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप कहीं सफल नहीं हो पाए। उल्टे ईरान युद्ध में वह बुरी तरह से फंस गए हैं। जहां से अब उन्हें निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगता था वह दुनिया के सबसे बड़े शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति हैं, उनकी बात को सब मानेंगे। एक समय पर वह अपने आप को शांति के नोबेल पुरस्कार का हकदार मानकर चल रहे थे। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप इतना झूठ बोलने के बाद भी अपने मनोवांछित फल को प्राप्त नहीं कर पाए। इस दुख का एहसास डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा किसको हो सकता है। जिस ईरान पर पिछले 47 सालों से अमेरिका ने प्रतिबंध लगा कर रखा और ईरान की जनता को भारी कष्ट पहुंचाया। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई और हमले में 165 से ज्यादा जिन बच्चों की हत्या की थी, लगता है यह पाप ट्रंप का पीछा नहीं छोड़ रहा है। अमेरिका जैसे महा शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान जैसा कमजोर देश इस तरह की चुनौती देगा यह उनके सपने में भी नहीं था। ईरान ने जिस तरह से पिछले 4 महीने में अमेरिका को उसकी औकात दिखाई है इसकी कल्पना शायद किसी ने भी नहीं की थी। ईरान जैसा कमजोर देश, जिस पर इतने सारे प्रतिबंध लगे हों, अमेरिका ने जहां सत्ता पलटने की भरपूर कोशिशें कर लीं हों, आर्थिक दृष्टि से कमजोर ईरान उसे इस तरह से मात देगा। उसके कारण डोनाल्ड ट्रंप को इतने सारे झूठ बोलने पड़ेंगे। 40 झूठ बोलने के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप अपने आप को इस युद्ध से बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने कहा था कि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आज 14 जून को जन्मदिन है। उन्होंने यह कहा था कि वह अपने जन्मदिन पर सारी दुनिया को एक तोहफा देने जा रहे हैं। लेकिन यह तोहफा भी वह नहीं दे पा रहे हैं। इस समझौता पत्र पर जिनेवा में हस्ताक्षर किया जाना था, लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अब्बास आराघची ने यह कहकर समझौते पर पलीता लगा दिया है कि अभी समझौते की शर्तों पर सहमति नहीं बनी है। समझौते की शर्त पर सहमति बन जाने के बाद ईरान की सरकार जनता के सामने उन शर्तों को रखकर जनता की मंजूरी मिलने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर करेगी। ईरान की राजनीति, कूटनीति और सामरिक रणनीति अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप के लिए बहुत भारी पड़ी है। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू भी ईरान की रणनीति के सामने बेबस हो गए हैं। अगले कुछ ही महीनो में इजराइल में आम चुनाव होने जा रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू जिस तरह से इस युद्ध में पराजित हो रहे हैं, ऐसी स्थिति में राजनीति के क्षेत्र में इन दोनों नेताओं का जो दबदबा था वह दबदबा पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर खड़ा हो गया है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के इस युद्ध से राजनेताओं को सबक लेने की जरूरत है। आप कितने भी मजबूत हों लेकिन यदि किसी को जरूरत से ज्यादा आप परेशान करते हैं या दबाते हैं तो ऐसी स्थिति में कोई भी ताकत कम नहीं होती है। रूस महाशक्ति था, महाशक्ति है लेकिन एक यूक्रेन जैसे छोटे देश ने जिस तरह से रूस का मुकाबला किया है। ईरान जिसके ऊपर पिछले 47 वर्षों से तरह-तरह के प्रतिबंध लगाकर लगातार उसे कमजोर किया गया था, उसने भी अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या के बाद जिस तरह से अपने आप को बचाने के लिए हर तरह से मुकाबला किया, उसने सारी दुनिया को आश्चर्यचकित किया है। वर्तमान स्थितियों को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने झूठ बोलकर भले अरबों डॉलर की कमाई शेयर बाजार से कर ली हो, लेकिन उनके झूठ ने उनकी और अमेरिका की साख में जो बट्टा लगाया है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती है। जिस तरह की स्थितियां वैश्विक स्तर पर बनी हैं, इस तरह से सत्ता में बैठे हुए लोगों को अपनी ताकत का जो अहंकार है वह अहंकार किस तरह से टूटता है, अमेरिका, ईरान और इजराइल युद्ध इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। एसजे/ 14 जून /2026