- सियासी चौपाल पर भतीजे के मोह ने कहीं का न छोड़ा नई दिल्ली (ईएमएस)। अब टीएमसी को बचाने मायावती का फॉर्मूला अपनाएंगी ममता? यह सवाल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर मचे घमासान को देखकर तेजी से उठने लगा है। राज्य में पार्टी की करारी हार के बाद लंबे समय से सुलग रहा आंतरिक असंतोष अब एक बड़े राजनीतिक विस्फोट के रूप में सामने आ चुका है। इन चुनावी नतीजों ने न केवल राज्य की सत्ता के समीकरणों को बदला है, बल्कि पार्टी के आंतरिक ढांचे को भी पूरी तरह से चरमरा कर रख दिया है। कोलकाता में 60 विधायकों की खुली बगावत के बाद अब देश की राजधानी दिल्ली में टीएमसी के 20 से अधिक लोकसभा सांसदों ने भी बगावती रुख अख्तियार कर लिया है। इस अभूतपूर्व संकट के बीच ममता बनर्जी के सबसे पुराने, वफादार और मुखर सहयोगी कल्याण बनर्जी ने भी अब सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व को चेतावनी दे दी है। इस कदम ने पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही ‘बुआ बनाम भतीजा’ की जंग को आधिकारिक और बेहद निर्णायक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम की तुलना वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बसपा प्रमुख मायावती द्वारा लिए गए उस कड़े फैसले से की जा रही है, जब उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को परिपक्वता आने तक पार्टी के सभी महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया था। अब ठीक वैसी ही स्थिति ममता बनर्जी के सामने है, क्योंकि पुराना कैडर और कद्दावर नेता केवल ‘दीदी’ के चेहरे और संघर्ष से जुड़े हैं, वे किसी कॉर्पोरेट नेतृत्व को स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ममता बनर्जी इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। उनके सामने अब दो ही रास्ते बचे हैं। पहला विकल्प यह है कि वे वरिष्ठ नेताओं की भावना का सम्मान करते हुए मायावती फॉर्मूला अपनाएं और अभिषेक बनर्जी को संगठन के मुख्य पदों से हटाकर बैकसीट पर भेज दें, ताकि पार्टी को बिखरने से रोका जा सके। दूसरा विकल्प यह है कि वे अपने भतीजे के फैसले के साथ खड़ी रहें, लेकिन ऐसी स्थिति में पुराना धड़ा पूरी तरह बगावत कर अलग राह चुन सकता है, जिससे पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। विपक्ष की बढ़ती मजबूती के बीच ममता बनर्जी को अब जल्द ही यह तय करना होगा कि उनके लिए परिवार बड़ा है या वह संगठन, जिसे उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचकर खड़ा किया था। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, करीब 60 विधायकों और दोनों सदनों के 30 से अधिक सांसदों ने अब एक सुर में अभिषेक बनर्जी को पार्टी की इस करारी हार और बिखराव के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। वरिष्ठ नेताओं का स्पष्ट आरोप है कि पार्टी में आई इस ऐतिहासिक टूट और पतन के एकमात्र सूत्रधार अभिषेक बनर्जी और उनकी ‘कॉर्पोरेट स्टाइल’ की राजनीति है। इस अप्रत्याशित आंतरिक विद्रोह ने राजनीतिक हलकों में यह बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या ममता बनर्जी अपने वजूद को बचाने के लिए वही कड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाएंगी, जो कभी बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद के खिलाफ उठाया था? वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने बंद कमरे में और सार्वजनिक बयानों के जरिए यह साफ कर दिया है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करके ‘डायमंड हार्बर मॉडल’को पूरी पार्टी पर जबरन थोपना ही टीएमसी की लुटिया डूबने का मुख्य कारण बना है। पार्टी के पुराने दिग्गजों का मानना है कि अभिषेक बनर्जी की रणनीतियों ने जमीन से जुड़े नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया, जिससे चुनावी जमीन पूरी तरह खिसक गई। सांसदों का यह भी आरोप है कि टिकट बंटवारे से लेकर सांगठनिक फैसलों तक में केवल अभिषेक के वफादारों को तवज्जो दी गई, जिसने पार्टी को दो फाड़ कर दिया। वीरेंद्र/ईएमएस/14जून2026