लेख
01-Jan-2026
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यात्रा कल भी थी, आज भी है। समय नया पुराना नहीं होता, महसूसना नया पुराना होता है। कल काल पर केंचुल था, आज उतर गया है। सब-कुछ ताजा लग रहा है। नये सपने, नयी ख्वाहिशें। वैसे समय यात्रा पर अनवरत चल रहा है। वह खंडित नहीं है, लेकिन हम सब उसे खंड खंड कर देखते हैं। हम काल के साथ जितनी दूरी तय करते हैं, वह समय का एक खंड ही है। हम समय को खंडित कर ज्ञान प्राप्त करते हैं। यही वजह है कि हमारा ज्ञान खंडित होता है। अखंड ज्ञान के लिए अखंड काल का अनुभव करना होगा, जो संभव नहीं होता। खंडित ज्ञान हमें अपने पूर्वाग्रहों से भर देता है। यह पूर्वाग्रह हमें अहंकारी बनाता है। ज्ञान के मंथन से पूर्वाग्रहों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं। जो भी हो। 2026 की काल -यात्रा करुण हो। विवेकी हो। सत्य और न्याय पर आधारित हो। कल साल का अंतिम दिन था। साथियों के साथ ‘ क्या खोया, क्या पाया ‘ विषय पर संवाद हुआ। बादल से लुका छिपी करता सूरज और जमीन पर हम सब संवाद करते हुए। हम सबने महसूस किया कि अभिव्यक्ति खतरे में है। गर्दन पर तलवार लटकी है।‌ सत्य न बोल सकते हो, न‌ सुन सकते हो। असत्य का प्रचार करने मीडिया भोंपू बनी बैठी है। हवा में भी जासूसी है। पूरी दुनिया में बहुसंख्यकवाद हावी है। बहुसंख्यकवाद भी ऐसा कि उसे अल्पसंख्यक से खतरा महसूस होता है। बांग्लादेश हो या पाकिस्तान हो, श्रीलंका हो या भारत हो, जर्मनी हो या नाइजीरिया हो। बहुसंख्यकवाद किसी की गर्दन रेत दे या जिंदा जला दे, हम अपने धर्म की दुहाई देकर प्रसन्न होंगे। लोकतंत्र की तो हवा निकल रही है। सरकार को सभी शक्तियां चाहिए। उसके बिना पत्ते भी न हिलें। आदमी के पास तन है और मन है। तन की सुविधा के लिए बहुत सारी चीजों का आविष्कार किया। तन आरामतलबी हो गया। अब मन के लिए आविष्कार हो रहा है। हम एआई तक आ गये हैं। कविता, कहानी, प्रोजेक्ट - सब-कुछ वे बनायेंगे। तन सुविधा तलाश करते करते बीमार रहने लगा है। अब मन की बारी है। हम लोग पैदा करते हैं। फिर इलाज ढूंढते हैं। रुग्ण मन और तन कैसी दुनिया बनायेगा? कल बोलते बोलते एक छात्र ने कहा। घर का कुआं गया, फिर चापानल गया और बोतल का पानी पीकर शान बघार रहे हैं कि हमारा विकास हुआ है। दरअसल हम सबका बैटरी डाउन हो गया है। मुझे अब लगता है कि मार्क्सवाद की चमक फीकी हुई है। गांधीवाद, अम्बेडकरवाद या लोहियावाद के सपनों पर भी पानी फिर गया है। अब एक नयी विचारधारा चाहिए, जो समय की जटिलताओं को समझ सके और लोगों की चेतना को प्रभावित कर सके। बहुसंख्यकवाद दक्षिणपंथियों के लिए सुगम रास्ता है सत्ता तक पहुंचने का। शेष समस्याएं यों ही मुंह बायें खड़ी रहती हैं। वे यों ही संविधान पर हमला नहीं कर रहे और उनके लोग मनुस्मृति और शरीयत को अतिरिक्त तरजीह दे रहे हैं। दक्षिणपंथ का एक नया रूप सामने है। वह भूमंडलीकरण का भी तार बन बैठा है। खैर, कल शाम को अचानक आसमान एकदम साफ हो गया था। न कुहरा, न बादल। उस वक्त तक सूर्य अस्ताचलगामी हो रहे थे। ठंड तो थी ही। सुबह जब जगा तो घना कुहरा छाया था। टहलने निकला तो दो बांस दूर कुछ दिखाई नहीं पड़ता था। सड़कें भींगी -भींगी सी थी। जब बगीचे से होकर गुजरा तो आम के पत्तों से टप- टप बूंदें गिर रहीं थीं। आम से बिछुड़े पत्ते भींग गये थे। बगीचे के मध्य से गुजरते हुए अवर्णनीय सुख का अनुभव हो रहा था। प्रकृति निस्संदेह जीवन के लिए सभी चीजें मुहैया करती हैं। वे मनुष्य को सौंदर्य से भर देती हैं। हमें नये वर्ष में प्रकृति को केंद्र में रखकर एक नयी वैचारिक सरंचना गढ़ सकते हैं। ईएमएस / 01 जनवरी 26