नर्मदा जयंती) नदियाँ पृथ्वी माता के तन की कोशिकाएँ हैं। वे माता वसुन्धरा का अभिषेक कर उसे शस्य-श्यामल बनाती हैं और अपने समीपस्थ क्षेत्रों को अपार सौंदर्य प्रदान करती हैं। नदियाँ आर्थिक-विकास का प्रमुख साधन हैं और सांस्कृतिक चेतना की संवाहक भी हैं। मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा का समारंभ नदियों के तट से ही हुआ है। अतः नदियों को विश्व के सभी देशों में महत्व प्राप्त है। प्राचीन मिस्र में नील नदी की पूजा होती थी। ब्रिटेन में टेम्स नदी को फादर टेम्स कहकर पुकारा जाता है। भारत में तो नदियों को देवी-देवता के रुप में ही स्वीकार कर लिया गया। विश्व के आदि ग्रंथ ऋग्वेद में नदी-देवता का स्पष्ट उल्लेख है। भारतीय-समाज में वैदिक युग से लेकर आज तक नदियाँ सर्वत्र समादृत व पूजित रहीं हैं। भारत में पूजी जाने वाली नदियों में नर्मदा का स्थान प्रधान है। नर्मदा पश्चिम की ओर बहने वाली देश की सबसेे बड़ी नदी है। मेकल पर्वत श्रेणियों से निकल कर नर्मदा विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के मध्य सँकरी घाटियों से होकर पश्चिम-दिशा की ओर बहती है। यह अपने उद्गम-स्थल अमरकण्टक (22,40॰उ.,8045॰ पू.) से प्रारंभ होकर भृगुकच्छ( भड़ौंच 21,43॰ उ.,72,57॰पू.) के निकट खम्भात की खाड़ी में अरब सागर में गिरती है। इसकी कुल लम्बाई 1310 कि.मी. तथा अपवाह क्षेत्र 98800 वर्ग कि.मी. है। पद्मपुराण में इसकी लम्बाई सौ योजन से कुछ अधिक व चैड़ाई दो योजन बताई गई है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र की सीमाएँ आती हैं। नर्मदा के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 89.8 प्रतिशत भाग मध्यप्रदेश में, 8.5 प्रतिशत भाग गुजरात में तथा शेष 1.7 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र राज्य में है। इसकी सीमा में कुल 25 जिलों के अंश सम्मिलित हैं, जिनमें से 20 जिले मध्यप्रदेश के, 4 गुजरात के और एक महाराष्ट्र का है। इस महत्वपूर्ण नदी का वार्षिक जल-प्रवाह 42 अरब घनमीटर है। कुल प्रवाह का 90 प्रतिशत भाग जून से सितंबर तक वर्षा ऋतु में बहता है। नर्मदा का उद्गम स्थल मध्यप्रदेश राज्य के शहडोल जिले में स्थित मैकल पर्वत श्रेणी की अमरकण्टक पहाड़ी है, जो समुद्र की सतह से लगभग 3500 फीट ऊँची है। नर्मदा का जलस्रोत भूमिगत है। वह माई की बगिया में प्रथम बार बाह्य धरातल पर प्रकट हुई है, किन्तु इसे ही नर्मदा का उद्गम स्थल नहीं कहा जा सकता। माई की बगिया में प्रथम बार दिखाई देने के पश्चात वह पुनः लुप्त हो जाती है और तत्पश्चात नर्मदा कुण्ड में पुनः प्रकट होती है। इससे सुस्पष्ट है कि अमरकण्टक के अन्तस्थ अनेक स्रोत मिलकर नर्मदा की धारा को जन्म देते हैं और उसे पुष्ट करते हैं। धरातल के गर्भ में निहित ये समस्त स्रोत नर्मदा के उद्गम-बिन्दु हैं। नर्मदा के भौतिक महत्त्व से अधिक उसका धार्मिक महत्त्व है। पुराण-साहित्य में नर्मदा को कल्याण-कारिणी देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे सरस्वती और लक्ष्मी के समान ही चतुर्भुजी हैं। उनके कर-कमल में वीणा सुशोभित है। उनका वर्ण नील-कमल के समान है और वे भूरे रंग के मकर की पीठ पर कमलासन में विराजमान हैं। पौराणिक-साहित्य में नर्मदा को गंगा से भी अधिक महत्त्व प्राप्त है। उनके अवतरण की अनेक कथाएँ विविध पुराणों में सुलभ हैं। स्कंदपुराण में उनके अवतरण की कल्पभेद से तीन कथाएँ वर्णित हैं। इस पुराण के अनुसार नर्मदा का प्रथम अवतरण आदि कल्प के सतयुग में राजा हिरण्यतेजा के तप से हुआ। इस कथा में हिरण्यतेजा ने नदी-रहित पृथ्वी पर धार्मिक कार्यों के संपादन के लिए शिव की तपस्या करके उदयाचल पर नर्मदा की धारा को उतारा। दूसरा अवतरण दक्ष सावर्णि-मन्वन्तर में भगवान शिव के शरीर से निसृत, स्वेद बिंदुओं से हुआ और तीसरा अवतरण वैष्णव मन्वन्तर में राजा पुरूरवा के तप के परिणाम-स्वरूप हुआ। इसमें नर्मदा की धारा को विंध्याचल के पुत्र पर्यक ने अपने शिखर पर धारण किया। इन कथाओं में राजा हिरण्यतेजा और राजा पुरूतवा की कथाएँ लगभग समान हैं। इनके अतिरिक्त पुराणों में नर्मदाजी के जन्म की अनेक अन्य कथाएँ भी वर्णित हैं, जिनमें से दो विशेष रूप से प्रख्यात हैं। प्रथम कथा के अनुसार जब भगवान शंकर, अन्धकासुर का वध करके प्रसन्न भाव से मेकल पर्वत पर सुखसीन थे तब करूणार्द्र होने के कारण उनके भाल पर विराजित सोमकला से एक बूँद पृथ्वी पर झरी। पृथ्वी का स्पर्श पाते ही वह एक सुंदरी कन्या के रूप में परिणत हो गई - ‘‘नीलोत्पल दल श्यामा सर्वावयव सुन्दरी सुद्विजा सुमुखी बाला सर्वाभरण-भूषिता।’’ इस प्रकार नीलोत्पल-वर्णा, सर्वांग-सुन्दरी तथा सर्वालंकारालंकृता वह चारूवदना कन्या शिव से वरदान पाकर नर्मदा माँ के रूप में लोक-विख्यात हुई। दूसरी कथा के अनुसार कभी ब्रह्मा के नेत्रों से दो अश्रु झरे, जिनमें से प्रथम नर्मदा नदी के रूप में और दूसरा शोण नदी के रूप में धरती पर प्रवाहित हुआ। माता नर्मदा की जन्मकथाओं के आधार पर पुराणकारों ने उनके अनेक नामों की चर्चा की है। इनमें से पन्द्रह नाम प्रमुख हैं -नर्मदा, त्रिकूटा, दक्षिण गंगा, महती, सुरसा, कृपा, मंदाकिनी, महार्णवा, रेवा, करभा, रंजना, विपादा, विपाशा, विमला, एवं वायुवाहिनी। इन नामों के अतिरिक्त इन्हें शिव की कला होने के कारण मेकला, मेकल पर्वत के शिखर पर उतरने के कारण मेकलसुता, रूद्र देह से प्रकट होने के कारण रूद्र-देहा, शिवतनया, शांकरी, शिवकण्डोदरी, इंदुजा, जटाशंकरी, शिवसुता आदि संज्ञाओं से भी पुकारा जाता है। इन समस्त नामों में नर्मदा और रेवा नाम सर्वाधिक प्रख्यात हंै। कभी क्षय न होने के कारण और सुख प्रदायिका होने के कारण नर्मदा नाम सर्वथा सार्थक है। कलरव करते हुए बहने के कारण रेवा संज्ञा भी अर्थपूर्ण है। पुराणों में नर्मदा की महिमा का सविस्तार वर्णन हुआ है। कूर्मपुराण में नर्मदा को गंगा से भी श्रेष्ठ बताया गया है - ‘‘पुण्या कनखले गंगा कुरूक्षेत्रे सरस्वती ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा। त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम् सद्यः पुनाति गांगेय दर्शनादेव नार्मदम्।’’ मत्स्यपुराण के अनुसार अमृतवाहिनी नर्मदा अमर हैं। प्रलयकाल में भी उनका नाश नहीं होता है - ‘‘नर्मदा च नदी पुण्या मार्कण्डेयो महानृषिः भवो वेदा पुराणानि विद्याभिः सर्वतो वृतम्। त्वया सार्थमिदं विश्व स्थास्यति अन्तर संक्षये एवमेकार्णवे जाते चाक्षुषान्तर संक्षये।’’ पद्मपुराण में वर्णित महर्षि वशिष्ठ के अनुसार नर्मदा के तट पर जाकर देवताओं व पितरों का तर्पण करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है। स्कंदपुराण के अनुसार नर्मदाजल में गिरने वाले तृण-पत्र तक शिवरूप बन जाते हैं। इस पवित्र नदी के तट पर एक रात-दिन उपवास करने से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार पुराणों में नर्मदा की महिमा सर्वत्र वर्णित है। नर्मदा के पुण्यतट पर असंख्य तीर्थस्थल स्थित हैं। पद्मपुराण में अमरकंटक पर्वत के चारों ओर साठ करोड़ साठ हजार तीर्थाें की स्थिति बताई गई है। इनमें से पत्रेश्वर, अंगारेश्वर, कुण्डलेश्वर, विमलेश्वर, पिपलेश्वर, पुष्करिणी, शूलभद्र, भीमेश्वर, नर्मदेश्वर, आदित्येश्वर, मल्लिकेश्वर, वरूणेश्वर, नीराजेश्वर, कोटितीर्थ, शक्रतीर्थ, सोमतीर्थ आदि प्रमुख हैं। इन तीर्थों के दर्शन से अक्षय-पुण्य की प्राप्ति होती है। मध्यप्रदेश में इन्दौर के निकट नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर का प्रसिद्ध तीर्थ है, जो शिव के बारह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में एक है। इनके दर्शन के लिए नर्मदा की प्रदक्षिणा का पौराणिक विधान है, जो सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्त्व का है। नर्मदा प्रदक्षिणा का मार्ग 1780 मील लंबा है। यह प्रदक्षिणा अमरकंटक अथवा हंडिया से प्रारंभ होती है। इसे पूर्ण करने में 108 दिन से लेकर तीन वर्ष, तीन मास व तेरह दिन तक का समय लगता है। नर्मदा तट पर आयोजित होने वाले मेले उसके सांस्कृतिक महत्त्व के द्योतक हैं। इनमें अमरकंटक, ब्राह्मण-घाट और बांद्रा बाँध के मेले विशेष महत्त्व के हैं। इन मेलों में भारतीय संस्कृति के मूल-तत्त्व सुरक्षित हैं। नर्मदा तटवर्ती जनजातियों की संस्कृति भी इन मेलों में परिलक्षित होती है। नर्मदा के पौराणिक व सांस्कृतिक महत्त्व के समान ही उसका साहित्यिक महत्त्व भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नर्मदा के वर्णन पुराण-साहित्य की अमूल्य निधि हैं दण्डिन और राजशेखर के काव्य में नर्मदा की चर्चा है। कालिदास ने मेघदूत में नर्मदा को रेवा नाम से प्रस्तुत किया है और उसकी जल-धाराओं की तुलना गज के तन पर चित्रित रेखाओं से की है। नर्मदा के महत्त्व पर आधारित अनेक वंदनाएँ व स्तोत्र भी संस्कृत साहित्य में सहज सुलभ हैं। इनमें से आद्यशंकराचार्य और बघेलवंशीय रीवा नरेश रघुराज सिंह द्वारा रचित नर्मदाष्टक विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। हिन्दी-साहित्य में भी नर्मदा की महिमा पर आधारित प्रचुर साहित्य-स्तुतियों के हिन्दी अनुवाद तथा आरतियाँ प्रमुख हैं। नर्मदा का प्रवाह बुंदेली, निमाड़ी, मराठी व गुजराती भाषी क्षेत्रों में प्रवाहित हुआ है। अतः इन विभाषाओं व भाषाओं में सहस्रों लोकगीत नर्मदा के गुणगान पर प्रस्तुत हैं, जो साहित्य की अमूल्य निधि है। इस प्रकार नर्मदा पौराणिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक-दृष्टि से सर्वथा महत्त्वपूर्ण है। (विभागाध्यक्ष हिन्दी शास. नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय ) .../ 24 जनवरी /2026