25-Jan-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। क्रिकेट वर्ल्ड कप को आमतौर पर खेल की निष्पक्षता, प्रतिस्पर्धा और जश्न का सबसे बड़ा मंच माना जाता है, लेकिन इसके इतिहास में ऐसे मौके भी आए हैं जब मुकाबलों के नतीजे मैदान पर नहीं, बल्कि मैदान के बाहर तय हुए। राजनीतिक तनाव, सुरक्षा चिंताएं और कूटनीतिक हालात कई बार इतने हावी रहे कि टीमों ने वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में खेलने से ही इनकार कर दिया। यह सिलसिला करीब 30 साल पहले शुरू हुआ था और समय-समय पर क्रिकेट के सबसे प्रतिष्ठित आयोजनों को प्रभावित करता रहा है। वर्ल्ड कप इतिहास में पहली बार ऐसा मामला 1996 के वनडे वर्ल्ड कप में सामने आया, जिसकी सह-मेजबानी भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका ने की थी। उस समय श्रीलंका गृहयुद्ध से जूझ रहा था और कोलंबो में हुए बम धमाके ने सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया था। हालांकि भारत और पाकिस्तान ने वहां श्रीलंका के खिलाफ मैच खेले, लेकिन ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ ने कोलंबो जाकर अपने ग्रुप मैच खेलने से इनकार कर दिया। नतीजतन, कहे बिना खेले ही श्रीलंका को वॉकओवर मिल गया, जिसने आगे चलकर टूर्नामेंट की तस्वीर ही बदल दी। इसके बाद 2003 का वनडे वर्ल्ड कप भी विवादों से अछूता नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और केन्या की संयुक्त मेजबानी वाले इस टूर्नामेंट में इंग्लैंड ने हरारे में जिम्बाब्वे के खिलाफ खेलने से इनकार कर दिया। दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध बेहद तनावपूर्ण थे और इंग्लैंड ने सुरक्षा के साथ-साथ राजनीतिक कारणों का हवाला दिया। वहीं न्यूजीलैंड ने भी नैरोबी जाकर केन्या के खिलाफ खेलने से मना कर दिया। इन दोनों फैसलों ने टूर्नामेंट की अंकतालिका और समीकरणों को काफी प्रभावित किया। साल 2009 में एक अलग ही मिसाल देखने को मिली, जब जिम्बाब्वे ने आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप से ही अपना नाम वापस ले लिया। यूनाइटेड किंगडम और जिम्बाब्वे के बीच लंबे समय से चले आ रहे खराब रिश्तों के चलते आईसीसी और जिम्बाब्वे क्रिकेट के बीच सहमति बनी कि “खेल के व्यापक हित” में जिम्बाब्वे टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लेगा। उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल किया गया, जिससे यह साफ हुआ कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का असर सिर्फ मैचों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी टीम की भागीदारी भी दांव पर लग सकती है। 2016 में बांग्लादेश में आयोजित अंडर-19 वर्ल्ड कप के दौरान ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए टूर्नामेंट से नाम वापस ले लिया। इससे पहले भी ऑस्ट्रेलिया ने बांग्लादेश दौरे से खुद को अलग कर लिया था। ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड का मानना था कि वहां ऑस्ट्रेलियाई हितों को खतरा बना हुआ है, इसलिए युवा खिलाड़ियों को जोखिम में नहीं डाला जा सकता। हाल के वर्षों में ऐसा ही मामला 2025 की आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में देखने को मिला, जब भारत ने पाकिस्तान जाकर खेलने से इनकार कर दिया। राजनीतिक तनाव और सुरक्षा चिंताओं के चलते टूर्नामेंट को हाइब्रिड मॉडल में आयोजित करना पड़ा और भारत ने अपने सभी मैच यूएई में खेले। अब टी20 वर्ल्ड कप 2026 से पहले भी इसी तरह की आशंकाएं सामने आ रही हैं, जहां बांग्लादेश ने भारत आकर खेलने से मना कर दिया है और अपने मैच श्रीलंका में कराने की मांग पर अड़ा हुआ है। आईसीसी ने फिलहाल इस मांग को खारिज कर दिया है, लेकिन अगर गतिरोध बना रहता है तो बांग्लादेश के लिए टूर्नामेंट से बाहर होने का खतरा भी पैदा हो सकता है। वर्ल्ड कप का इतिहास यह बताता है कि क्रिकेट सिर्फ बल्ले और गेंद का खेल नहीं है। कई बार राजनीति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंध ऐसे फैसले तय करते हैं, जो खेल की दिशा और दशा दोनों बदल देते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि टी20 वर्ल्ड कप 2026 से पहले यह विवाद किस मोड़ पर पहुंचता है और क्या क्रिकेट को एक और मैदान के बाहर तय हुआ फैसला देखने को मिलेगा। डेविड/ईएमएस 26 जनवरी 2026