क्षेत्रीय
05-Feb-2026
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जगदलपुर (ईएमएस)। बस्तर जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित नक्सल मुक्त हाे चुके चांदामेटा दो साल पहले तक धुर नक्सली गढ़ माना जाता था, कोलेंग के आगे जाने से लोग डरते थे। बस्तर जिले का आख़िरी गांव चांदामेटा एक ऐसा गांव, जो कभी नक्सलियों का हेडक्वार्टर हुआ करता था। दरभा ब्लॉक का यह सुदूर इलाका, जहां कभी डर, बंदूक और दबाव के साये में ज़िंदगी चलती थी, आज धीरे-धीरे भरोसे और सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है। नक्सलियों ने यहां करीब 15 एकड़ में ट्री-गार्ड बेस कैंप स्थापित किया था। जिसमें अपने मारे गए साथियों की स्मृति में 31 से 40 आम के पौधे रोपे गए थे, जिनके चारों ओर मोटी बल्लियों से मजबूत सुरक्षा घेरा बनाया गया था। आज भी मैदानी इलाके में खड़े ये आम के पेड़ उस दौर की कहानी बयां करते हैं। वहीं चांदामेटा के पटनमपारा मार्ग पर बना र्जजर हाे चुका नक्सली स्मारक आज भी मौजूद है। बताया जाता है कि यह स्मारक मल्ला नाम के युवक का है, जो नाट्य मंडली से जुड़ा था और नक्सल संगठन में शामिल होने के महज एक साल बाद मुठभेड़ में मारा गया। यह स्मारक आज भी उस हिंसक रास्ते की याद दिलाता है। चांदामेटा में सीआरपीएफ का कैंप खुलने के बाद नक्सली यहां से अपना ठिकाना छोड़कर चले गए। लेकिन जो आम के पौधे कभी नक्सली स्मृति के प्रतीक थे, आज उनकी देखरेख खुद गांव वाले कर रहे हैं। ग्रामीण कहते हैं नक्सलियों ने हमें बहुत सताया, लेकिन ये पेड़ एक अच्छा काम हैं, फल तो आखिर गांव के लोग ही खाएंगे, पौधों से हमें कोई दुश्मनी नहीं है। सुधीर जैन/चंद्राकर/05 फ़रवरी 2026