* गरवी गुर्जरी की पहल से विधानसभा परिसर में झलकी राज्य की लोक कला और कारीगरों का कौशल गांधीनगर (ईएमएस)| गुजरात की प्रजा का प्रतिनिधित्व करने वाली गुजरात विधानसभा अब गुजरात की प्राचीन, परंपरागत एवं समृद्ध सांस्कृतिक कला विरासत का दर्पण बनी है। आगामी 16 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र से पहले गुजरात विधानसभा परिसर राज्य की परंपरागत तथा सांस्कृतिक कला-कारीगरी के रंग में रंग गया है। बजट सत्र में आने वाले जन प्रतिनिधियों, अतिथियों तथा आगंतुकों के लिए विधानसभा परिसर की दीवारों – स्तंभों पर उकेरी गई अमदावादी मातानी पछेडी, कच्छी मड मिरर वर्क तथा आदिवासी वारली कला की लोक कलाकृतियाँ आकर्षण का केन्द्र बनेंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘विकास भी, विरासत भी’ विजन को साकार करने में अग्रसर मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की सरकार द्वारा राज्य की परंपरागत कला-कारीगरी को जनता के प्रतिबिंब समान विधानसभा परिसर में स्थान देकर एक नूतन कदम उठाया गया है और यह कदम समग्र राज्य की परंपरागत कला संस्कृति एवं उससे जुड़े हजारों कला-कारीगरों को उनके कौशल को परंपरागत रूप से आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणा देगा। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य में हस्तकला तथा हथकरघा कला-कारीगरी को निरंतर प्रोत्साहन मिलता रहा है और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए विधानसभा परिसर को गुजरात की समृद्ध कला विरासत से रंगा गया है। राज्य में परंपरागत कला-कारीगरी को जीवंत रखने का कार्य करने वाले सरकारी उपक्रम ‘गुजरात राज्य हथकरघा एवं हस्तकला विकास निगम’ (जीएसएचएचडीसी) लिमिटेड का ब्रैंड ‘गरवी गुर्जरी’ राज्य सरकार के ऐसे सकारात्मक प्रयासों को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है और उसी की पहल ने गुजरात के हजारों कला-कारीगरों का प्रतिनिधित्व करने वाले कला-कारीगरों को विधानसभा परिसर के रूप में गौरवमय मंच दिया है। इसके चलते गांधीनगर स्थित गुजरात विधानसभा परिसर केवल शासन का केन्द्र नहीं रहा, बल्कि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत दर्पण बन गया है। इस पहल अंतर्गत विधानसभा परिसर के विभिन्न क्षेत्रों में गुजरात की विविधतापूर्ण एवं लोक विरासत की झाँकी कराने वाली अनूठी लोक कलाकृतियाँ उकेरी गई हैं, जो राज्य की कला-कारीगरी की विविधता तथा वैभव को प्रतिबिंबित करती हैं। कुशलता के आधार पर तीन कलाओं का चयन गरवी गुर्जरी ने विधानसभा परिसर में राज्य की कला विरासत को प्रस्तुत करने के लिए एक सशक्त प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य किया, राज्य के प्रतिभाशाली हथकरघा-हस्तकला कारीगरों को मार्गदर्शन, प्रेजेंटेशन तथा उचित अवसर पर उपलब्ध कराया। इसके बाद गरवी गुर्जरी की टीम द्वारा कारीगरों की कला का व्यवस्थित प्रस्तुतिकरण तैयार कर पेश किया गया और उनकी कुशलता तथा कला के स्तर के आधार पर कलाओं का चयन किया गया। गुजरात विधानसभा परिसर के लिए चयनित प्रमुख लोक कलाकृतियों में (1) गुजरात का परंपरागत मड मिरर वर्क (2) छोटा उदेपुर का वारली आर्ट तथा (3) अहमदाबाद की मातानी पछेडी (परंपरागत कलमकारी कला) शामिल हैं। ये तीनों लोक कलाकृतियाँ आज विधानसभा परिसर की दीवारों तथा क्षेत्रों को सुशोभित कर रही हैं और राज्य की सांस्कृतिक पहचान को उजागर कर रही हैं। वारली कला द्वारा प्राचीन राजसभा से आधुनिक विधानसभा तक की यात्रा दीवारों पर उकेरी गई विधानसभा परिसर में वारली कला द्वारा प्राचीन राजसभा से आधुनिक विधानसभा तक की यात्रा तथा ग्रामीण से शहरी विकास की भावनात्मक एवं दृश्यात्मक झाँकी वारली पेंटिंग द्वारा प्रस्तुत की गई है। छोटा उदेपुर की प्रतिभाशाली वारली कारीगर अर्चनाबेन राठवा ने वारली कला का प्रदर्शन किया है। पिछले 8 वर्ष से गरवी गुर्जरी से जुड़ीं अर्चनाबेन को इस कला में वर्ष 2022 में राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। विधानसभा से पहले उन्होंने गुजरात मेडिकल डिपार्टमेंट (मेडिकल इमर्जेंसी मैनेजमेंट थीम), कमिश्नर ऑफ कॉटेज एंड रूरल इंडस्ट्रीज तथा खादी थीम जैसे प्रोजेक्ट्स पर सफल कार्य किया है। अर्चनाबेन कहती हैं, “गरवी गुर्जरी के मार्गदर्शन में विधानसभा जैसे गौरवपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम करने का अवसर मिलना हमारे लिए गर्व की बात है।” कच्छी मड मिरर वर्क कला से विधानसभा परिसर में सांस्कृतिक लोक कलाकृतियाँ जीवंत की गईं विधानसभा परिसर में गुजरात की परंरागत कच्छी मड मिरर वर्क कला का रंग भी छाया है। इस कला को नई पहचान देने वाले गिरीश ए. परमार आज इस लोक विरासत के महत्वपूर्ण कलाकार के रूप में विख्यात हैं। मुलतानी मिट्टी एवं रंगीन काँच का उपयोग कर तैयार होने वाली यह कला परंपरागत रूप से कच्छ के भूंगा (हट) घरों में देखने को मिलती थी, जिसे गिरीश परमार आधुनिक एवं प्रतिष्ठित स्थानों में सफलतापूर्वक प्रस्तुत कर रहे हैं। वे 26 जनवरी की टैब्लो परेड में गुजरात का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं तथा सचिवालय, अन्य सरकारी कार्यालयों और गरवी गुर्जरी के लिए कई विशिष्ट प्रोजेक्ट्स उन्होंने पूरे किए हैं। गुजरात विधानसभा परिसर में कार्य करने के अवसर के बारे में गिरीश परमार कहते हैं, “मैं गरवी गुर्जरी का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे विधानसभा जैसे गौरवपूर्ण स्थान पर मेरी परंपरागत मड मिरर (लेपन) वर्क कला प्रस्तुत करने का अवसर दिया। यहाँ देशभर के अधिकारी तथा आम जनता आती है और इस स्थान पर मेरी परंपरागत कच्छी कला प्रदर्शित होना मेरे लिए गर्व की बात है।” अमदावादी मातानी पछेडी कला ने किया परंपरा-आधुनिकता का संगम गरवी गुर्जरी के मार्गदर्शन तथा विश्वास से चितारा परिवार ने गुजरात विधानसभा परिसर में अहमदाबाद की प्राचीन मातानी पछेडी (कलमकारी) कला प्रस्तुत करने का गौरवपूर्ण अवसर प्राप्त किया। विधानसभा की दीवारों पर मातानी पछेडी द्वारा परंपरा एवं आधुनिकता का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया गया है, जो सांस्कृतिक विरासत को नई दिशा देता है। इस कला को जीवंत रखने वाले और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता चंद्रकांत चितारा इस परंपरागत कला के विशिष्ट प्रतिनिधि के रूप में जाने जाते हैं। मातानी पछेडी कला हाल में मुख्य रूप से चितारा परिवार द्वारा ही संरक्षित एवं आगे बढ़ाई जा रही है, जो गुजरात की सांस्कृतिक विरासत का गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रोजेक्ट में सहभागी रहीं चंद्रकांत चितारा की पुत्री मित्तल चितारा कहती हैं, “विधानसभा परिसर में काम करने का अवसर हमारे लिए गौरव का क्षण है। हमारी कलमकारी कला को राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा मिल रही है और जब हम यहाँ दीवार पर कलमकारी पेंटिंग कर रहे हैं, तब लोग उत्साह से जुड़कर कला को निहार रहे हैं। इस कला के लिए हमें गरवी गुर्जरी के मार्गदर्शन में अच्छा-खासा प्रतिसाद मिला है।” उल्लेखनीय है कि गरवी गुर्जरी द्वारा कारीगरों को केवल बाजार तक का मंच ही नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित सरकारी प्रोजेक्ट्स में भागीदारी के अवसर भी उपलब्ध भी कराए जा रहे हैं। इन प्रयासों से स्थानीय कारीगरों की प्रतिभा को राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल रही है। गुजरात की प्राचीन हस्तकला आज विधानसभा जैसे गौरवशाली परिसर में जीवंत बनकर राज्य की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है। गरवी गुर्जरी का यह प्रयास राज्य की कला-कारीगरी को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ है। सतीश/13 फरवरी