एक दार्शनिक समस्याओं के अत्यंत सटीक समाधान बताते थे। एक बार उनके पास एक सेनापति पहुंचा और स्वर्ग-नर्क के विषय में जानकारी चाही। दार्शनिक ने उसका पूर्ण परिचय पूछा तो उसने अपने वीरतापूर्ण कार्यो के बारे में सविस्तार बताया। उसकी बातें सुनकर दार्शनिक ने कहा - शक्ल-सूरत से तो आप सेनापति नहीं, भिखारी लगते हैं। मुझे विश्वास नहीं होता कि आपमें हथियार उठाने की क्षमता भी होगी। दार्शनिक की अपमानजनक बातें सुनकर सेनापति को गुस्सा आ गया। उसने म्यान से तलवार निकाल ली। यह देख दार्शनिक ठहाका लगाते हुए बोले - अच्छा तो आप तलवार भी रखते हैं। यह शायद काठ की होगी। लोहे की होती तो अब तक आपके हाथ से छूटकर गिर गई होती। अब तो सेनापति आपे से बाहर हो गया। उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गईं और वह दार्शनिक पर हमला करने को उद्यत हो गया। तभी दार्शनिक ने गंभीर होकर कहा - बस यही नर्क है। क्रोध में उन्मत्ता होकर आपने अपना विवेक खो दिया और मेरी हत्या करने को तत्पर हो गए। दार्शनिक की बात सुनकर सेनापति ने शांत होकर तलवार म्यान में वापस रख ली। तब दार्शनिक ने कहा - विवेक जाग्रत होने पर व्यक्ति को अपनी भूलों का अहसास होने लगता है। मन शांत होने से स्थिरता आती है और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है। यही अनुभूति स्वर्ग है। सेनापति को अपने प्रश्न का उत्तार मिल गया। सार यह है कि आत्मनियंत्रण से विवेक उपजता है, जिसके कारण अनुचित कर्म या व्यवहार पर रोक लगती है और जीवन में शांति व संतोष की अनुभूति होती है। ईएमएस फीचर