अजय कुमार त्रिपाठी कुशीनगर (ईएमएस)। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पडरौना नगर स्थित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज में उजागर हुए कथित फर्जी हस्ताक्षर कांड ने 700 छात्रों का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया है। यूपी बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले आवेदन-पत्रों में गंभीर अनियमितताएं पकड़ी गईं। जांच में अधिकृत हस्ताक्षरों की जगह फर्जी हस्ताक्षर पाए गए, जिसके बाद बोर्ड ने सभी संबंधित फार्म निरस्त कर दिए। राहत की आस में मामला जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहुंचा तो अदालत ने स्पष्ट शब्दों में ‘नो रिलीफ’ कहते हुए तत्काल हस्तक्षेप से इंकार कर दिया। सूत्रों के मुताबिक परीक्षा पंजीकरण, ऑनलाइन प्रविष्टि और अभिलेख सत्यापन में भारी चूक हुई। आरोप है कि नोडल अधिकारी के अधिकृत हस्ताक्षर के बिना ही आवेदन-पत्र अग्रसारित कर दिए गए। प्रधान लिपिक स्तर पर दस्तावेजों में कथित हेरफेर की बात सामने आई। बोर्ड की जांच में हस्ताक्षर फर्जी पाए गए और पूरा प्रकरण उजागर हो गया। नतीजा—700 छात्रों का प्रवेश पत्र जारी नहीं हुआ और वे परीक्षा कक्ष की दहलीज तक नहीं पहुंच सके। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय, जिसकी जिम्मेदारी अंतिम सत्यापन की थी, उसने समय रहते त्रुटियां क्यों नहीं पकड़ीं? क्या निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल रहा या फिर यह सब जानते-बूझते हुआ? यदि हस्ताक्षर फर्जी हैं तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। हाईकोर्ट ने अपने सख्त रुख में स्पष्ट कर दिया कि शैक्षणिक प्रक्रियाओं में वैधानिकता सर्वोपरि है और नियमों को दरकिनार कर राहत नहीं दी जा सकती। अदालत का यह संदेश शिक्षा विभाग के लिए चेतावनी है, लेकिन इसका सीधा खामियाजा उन छात्रों को भुगतना पड़ रहा है जिन्होंने पूरे साल कठिन परिश्रम किया था। इन छात्रों में कई सेना भर्ती की तैयारी कर रहे थे, कुछ पॉलिटेक्निक और स्नातक प्रवेश की राह देख रहे थे। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह झटका दोहरी मार है—एक साल की पढ़ाई के साथ कोचिंग, फॉर्म और अन्य खर्च भी डूब गए। छात्रों और अभिभावकों में आक्रोश चरम पर है। वे दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और विशेष परीक्षा की मांग कर रहे हैं। शिक्षा विभाग की साख पर भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यदि निगरानी और सत्यापन की प्रक्रिया इतनी कमजोर है कि सैकड़ों छात्रों का भविष्य दांव पर लग जाए, तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा? फिलहाल 700 छात्रों का एक साल बिना फेल हुए बर्बाद हो चुका है। जिम्मेदारी तय होने और ठोस कार्रवाई तक यह प्रकरण शिक्षा तंत्र पर काले धब्बे की तरह बना रहेगा। सवाल गूंज रहा है—सिस्टम की गलती की सजा आखिर छात्रों को ही क्यों? अजय कुमार त्रिपाठी ईएमएस