राष्ट्रीय
25-Feb-2026
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अब अपनी जररुत का तेल और गैस रुस से खरीदने की तैयारी में नई दिल्ली,(ईएमएस)। रूस-यूक्रेन के बीच जब युद्ध शुरू हुआ था, तब दुनिया के पश्चिमी देशों ने कसम खा ली थी कि वे रूस को दुनिया में बिल्कुल अकेला करके ही दम लेने वाले है। इसके बाद पश्चिमी देशों ने पाबंदियों की ऐसी झड़ी लगाई गई कि लगा रूसी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है। रूस को अलग-थलग करने चले देश आज खुद बंटे दिखे रहे हैं। इस पूरी कहानी में गेमचेंजर साबित भारत हुआ है। भारत ने जंग के बाद जिस तरह पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा, भारत के इस फैसले ने दुनिया के कई अन्य देशों को भी हिम्मत दी है। अब भारत की तरह ही कई और देश रूस के साथ डटकर खड़े हो गए हैं। स्थिति यह है कि जो देश कल तक रूस के पक्के दुश्मन बने हुए थे और हर दिन नई पाबंदियां लगाने की वकालत करते थे, वे भी अब पीछे हटते दिख रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआत से ही अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत पर भारी दबाव बनाया था कि वह रूस से तेल न खरीदे। उनका तर्क था कि रूस से तेल खरीदकर भारत एक तरह से युद्ध को फंड कर रहा है। लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को बिल्कुल साफ रखा। भारत सरकार का सीधा कहना था, हमारे लिए हमारे देश की 140 करोड़ की आबादी सबसे पहले है। अगर हमें कहीं से सस्ता तेल मिलेगा, जिससे हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम काबू में रहें और महंगाई न बढ़े, तब हम उस देश से तेल खरीदने को तैयार है। आज भी भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर रहा है। भारत के इस नेशन फर्स्ट वाले रवैये ने दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया। पूरी दुनिया को समझ आ गया कि एनर्जी सुरक्षा किसी भी देश का पहला अधिकार है और इसके लिए किसी महाशक्ति के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। भारत ने जो रास्ता दिखाया, अब यूरोपीय देश हंगरी भी उसी पर पूरी ताकत से चल पड़ा है। हंगरी ने यूरोपीय यूनियन की आंखों में आंखें डालकर साफ कहा हैं कि वह रूस से तेल खरीदने के मामले में किसी के दबाव में नहीं आएगा। हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो ने दो टूक कहा, हम मौजूदा विकल्पों से ज्यादा महंगे और कम भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत खरीदने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उनका सीधा सा मतलब था कि जब रूस हमें सस्ता और भरोसेमंद तेल और गैस दे रहा है, तब हम सिर्फ यूरोप की राजनीति के चक्कर में कहीं और से महंगा तेल क्यों खरीदें? सिज्जार्टो ने इस फैसले देश का अधिकार बताया। यानी हंगरी का अपना फैसला है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी करे, इसमें कोई दूसरा देश दखल नहीं दे सकता। हंगरी के इस रुख ने यूरोप के उन देशों की नींद उड़ा दी है जो रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना चाहते थे। हंगरी को पता हैं कि अगर उसने रूस से तेल और गैस लेना बंद किया, तब उसके देश में हाहाकार मच जाएगा, महंगाई आसमान छूने लगेगी और इंडस्ट्रीज बंद होने की कगार पर आएगी। इसलिए उसने कूटनीति से ज्यादा अपने देश की अर्थव्यवस्था को चुना है। एक समय था जब यूरोपीय यूनियन रूस के खिलाफ पाबंदियों का नया पैकेज लाने के लिए बस एक इशारे का इंतजार करता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। खुद यूरोपीय यूनियन ने मान लिया है कि फिलहाल रूस पर नई पाबंदियां लगाने के मामले में कोई फैसला नहीं हो पाएगा। हंगरी के इस कड़े रुख से जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देश काफी नाराज और परेशान हैं। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने कहा कि वे हंगरी से अपनी जिद छोड़ने की अपील करुंगा। वाडेफुल ने कहा, मुझे नहीं लगता कि हंगरी के लिए अपनी आजादी और यूरोपीय संप्रभुता के संघर्ष को धोखा देना सही है। हम एक बार फिर से बुडापेस्ट और ब्रसेल्स में हंगरी के सामने अपनी दलीलें रखने वाले और उनसे अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहने वाले है। लेकिन कूटनीति के जानकार मानते हैं कि जर्मनी की यह अपील शायद ही कोई असर दिखाए। यूरोप के कई देश अब अंदर ही अंदर यह समझ चुके हैं कि बिना रूसी ऊर्जा के उनका गुजारा मुश्किल है। आशीष/ईएमएस 25 फरवरी 2026