लेख
28-Feb-2026
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हर वर्ष 1 मार्च को शून्य भेदभाव दिवस (जीरो डिस्क्रिमीनेशन डे) मनाया जाता है। वास्तव में, इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य समाज में समानता(कानून और व्यवहार दोनों स्तरों पर) आपसी सम्मान तथा भेदभाव-मुक्त वातावरण को बढ़ावा देना है। सरल शब्दों में कहें तो इसका लक्ष्य भेदभावपूर्ण कानूनों और सामाजिक धारणाओं को समाप्त करना है। प्रारंभ में यह दिवस एचआईवी/एड्स से पीड़ित लोगों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव पर केंद्रित था, परंतु समय के साथ यह रंग, धर्म, शारीरिक बनावट, लैंगिक पहचान और अन्य सभी प्रकार के भेदभावों के विरुद्ध एक वैश्विक आंदोलन का रूप ले चुका है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र(यूएन) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा सक्रिय रूप से मनाया जाता है। यहां पर यह उल्लेखनीय है कि इस दिवस की शुरुआत यूएन-एड्स द्वारा की गई थी। यूएन-एड्स, अर्थात् जॉइंट यूनाइटेड नेशंस प्रोग्राम ऑन एचआईवी/एड्स, संयुक्त राष्ट्र का एक प्रमुख कार्यक्रम है जिसकी स्थापना वर्ष 1996 में एचआईवी/एड्स महामारी से निपटने के लिए की गई थी। पाठकों को बताता चलूं कि इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में स्थित है। यह संगठन विश्वभर में एचआईवी संक्रमण की रोकथाम, संक्रमित लोगों को उपचार और देखभाल उपलब्ध कराने तथा इस रोग से जुड़े भेदभाव और सामाजिक कलंक को समाप्त करने के लिए कार्य करता है। साथ ही, यह विभिन्न देशों की सरकारों को नीतियाँ बनाने, जागरूकता अभियान चलाने और वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे के रूप में समाप्त करने के वैश्विक लक्ष्य की प्राप्ति में सहयोग प्रदान करता है। यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास पर दृष्टि डालें तो इसकी घोषणा दिसंबर 2013 में विश्व एड्स दिवस के अवसर पर की गई थी और पहली बार इसे 1 मार्च 2014 को मनाया गया। इसकी पहल यूएन-एड्स के तत्कालीन कार्यकारी निदेशक मिशेल सिदिबे ने की थी। प्रत्येक वर्ष इस दिवस की एक थीम निर्धारित की जाती है। स्पष्ट रूप से कहें तो सभी के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, सभी के अधिकारों की रक्षा करें इसकी वास्तविक और आधिकारिक थीम है, जो विशेष रूप से उन भेदभावपूर्ण कानूनों को हटाने पर बल देती है जो लोगों को उपचार और सम्मान से वंचित करते हैं। दूसरी ओर, पीपल फर्स्ट का नारा मूल रूप से विश्व एड्स दिवस (1 दिसंबर) के अभियान से जुड़ा है। चूँकि दोनों अभियानों का नेतृत्व यूएन-एड्स ही करता है, इसलिए कई बार सोशल मीडिया और इंटरनेट पर इन नारों को एक-दूसरे से भ्रमित कर दिया जाता है। निष्कर्षतः 1 मार्च के शून्य भेदभाव दिवस की आधिकारिक थीम अधिकारों और स्वास्थ्य की रक्षा पर केंद्रित है, जबकि पीपल फर्स्ट एक व्यापक मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक है। इस दिवस का प्रतीक तितली (बटरफ्लाई) है, जो परिवर्तन और कायाकल्प का संदेश देती है। तितली रूपांतरण (ट्रांसफॉर्मेशन) का प्रतीक है। जिस प्रकार एक तितली अपने कोकून से निकलकर पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है और अपनी सुंदरता से संसार को आकर्षित करती है, उसी प्रकार समाज को भी भेदभाव की पुरानी मानसिकता त्यागकर समानता और समावेशन की नई सोच अपनानी चाहिए। यह दिवस केवल एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त भय, भ्रांतियों और कलंक को दूर करने का भी संदेश देता है। विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीयर) समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा पर बल दिया जाता है, क्योंकि ये वर्ग अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रोजगार के अवसरों में असमानता का सामना करते हैं। यह दिवस लोगों को यह समझाने का प्रयास करता है कि एचआईवी सामान्य सामाजिक संपर्क से नहीं फैलता तथा समय पर जाँच, परामर्श और उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। निष्कर्षतः, शून्य भेदभाव दिवस समाज में समानता, सम्मान और मानवाधिकारों की भावना को सुदृढ़ करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह हमें सिखाता है कि जाति, लिंग, धर्म, भाषा या स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करना अमानवीय है। समान अवसर, न्याय और गरिमा प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। तो आइए, हम सब मिलकर ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें, जहाँ हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो। (फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 28 फरवरी /2026