लेख
28-Feb-2026
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सीबीआई के विशेष जज जितेंद्र सिंह ने 598 पेज का निर्णय दिया है। निर्णय में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित सभी 23 आरोपियों को कोर्ट ने सबूत के अभाव में आबकारी नीति घोटाले के मामले में बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, बिना सबूत के आरोपियों को आपराधिक मुकदमे में घसीटना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। आपराधिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल जांच एजेंसी द्वारा किया गया है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, न्यायिक जांच की कसौटी पर अभियोजन पक्ष जरा भी नहीं टिक पाया। कोर्ट ने आरोपियों को फंसाने के लिए व्यापक साजिश के दावे की पुष्टि की है। जो सीबीआई के लिए सबसे बड़ा झटका है। अदालत ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली को पूर्व नियोजित और कोरियोग्राफड बताते हुए गंभीर टिप्पणी की है। विशेष न्यायाधीश ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हुए कहा, आपराधिक मुकदमे में इस तरह से किसी को भी नहीं उलझा सकते हैं। राजनीतिक असहमति को आपराधिक मामलों के रूप में प्रस्तुत करने की कोर्ट ने तीव्र आलोचना फैसले में की है। उल्लेखनीय है, जांच एजेंसी ने साउथ लावी के नाम से तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री की बेटी कविता को 165 दिन तक हिरासत में रखा, राज्यसभा सांसद संजय सिंह को अकारण 181 दिनों तक जेल में बंद करके रखा गया था। इस पर न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने फैसले में उत्तर और दक्षिण के बीच में राजनीतिक विद्वेष फैलाने का कृत्य माना है। न्यायालय ने आबकारी अधिकारी कुलदीप सिंह को आरोपी नंबर एक बनाने पर कड़ी आपत्ति फैसले में दर्ज की है। सीबीआई ने जिस तरह से आबकारी नीति को जबरिया अपराध साबित करने के लिए एक के बाद एक कई लोगों को फंसाती चली गई। संदिग्ध गवाह बनाए गए। काल्पनिक सबूत बयान के आधार पर तैयार करने की कोशिश की गई। विशेष न्यायाधीश ने सीबीआई के अधिकारियों ने जांच करते हुए चुनाव प्रचार, होटल बुकिंग, और भुगतान इत्यादि की जांच की। चुनाव आयोग के अधिकारों का उपयोग सीबीआई ने किया है। अधिकारियों ने संविधानिक सीमाओं को पार किया है। जिन लोगों ने पैसे लेने और देने के आरोप स्वीकार किए थे। सीबीआई ने उन्हें गवाह बना लिया। उन गवाहों के बयान पर अन्य लोगों को फंसाया गया। अदालत ने फैसले में कहा अभियोजन के बयान की कॉपी अदालत को नहीं मिली। रिकॉर्ड को देखने से पता लगता है, जांच एजेंसी ने अदालत को भी दृग भ्रमित किया है। ट्रायल कोर्ट ने जिस तरह से सारे मामलों का विवेचन करते हुए सबूत के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया है, उसके बाद केंद्र सरकार, जांच एजेंसी सीबीआई और ईडी द्वारा चुनाव के ठीक पहले विपक्षी दलों पर जिस तरीके की कार्रवाई की गई थी। जिस तरह से विधानसभा और लोकसभा के चुनाव को प्रभावित किया गया है। इस सभी कार्यवाही का लाभ भाजपा को मिला। उसको लेकर देश में एक नया दबाव सत्ता पक्ष और जांच एजेंसियों के ऊपर पडना शुरू हो गया है। कोर्ट के फैसले पर केजरीवाल ने मीडिया के सामने रोते हुए कहा, प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का सियासी षड्यंत्र था। उनकी पार्टी के पांच बड़े नेताओं को चुनाव के पहले जेल में बंद कर दिया गया। मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जेल भेज कर आम आदमी पार्टी को बदनाम कर चुनाव लड़ने से रोकने का हर संभव प्रयास किया। अरविंद केजरीवाल ने पत्रकार वार्ता में मोदी और शाह को चुनौती देते हुए कहा, यदि भाजपा में दम है, तो दिल्ली विधानसभा और लोकसभा का दोबारा चुनाव कराएं। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने का काम किया है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उनकी आम आदमी पार्टी और सभी विपक्षी दल आक्रामक हो गए हैं। सीबीआई और ईडी द्वारा जिस तरह से विपक्षी राजनेताओं को निशाने पर लिया गया है। राजनीतिक दलों के नेताओं को आपराधिक मामले में फंसाया गया है। चुनाव के ठीक पहले दोनों एजेंसियां सीबीआई, ईडी और बाद में इसमें इनकम टैक्स भी शामिल हो गया था। पूरी तरह से सरकार के दबाव में विपक्षियों के खिलाफ जो कार्रवाई कर रहे थे। इस फैसले के बाद अब विपक्ष को नई संजीवनी मिल गई है। सत्ता पक्ष के लिए भविष्य में कानून और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करना आसान नहीं होगा। अभी तक विपक्षी दल दबाव में थे। अब विपक्ष पूरी तरह से मुखर हो चुका है। केंद्रीय प्रवर्तन निदेशालय ईडी को जो विशेष अधिकार मिले थे, पिछले कई वर्षों से उनका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग सत्ता पक्ष के लिए हो रहा था। जांच एजेंसी के पास विशेष अधिकार होने के कारण हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में विपक्षी नेताओं को ना तो राहत दे पा रहे थे, ना ही विपक्षी नेताओं के मामलों की सही सुनवाई हो पा रही थी। कोर्ट के अंदर ईडी के अधिकारी और वकील जो बोल देते थे, अदालतों को वही सच मानना पड़ता था। राउज एवेन्यू कोर्ट की विशेष अदालत ने इस फैसले में जिस तरह से सीबीआई जांच एजेंसी और उसके अधिकारियों की अवैधानिक कार्यवाही का उल्लेख किया है, उसके कारण जांच एजेंसियों और केंद्र सरकार की मुसीबतें बढ़ना तय हो गई हैं। जांच एजेंसियों ने जिस तरह से विपक्षी दलों के नेताओं को लंबे समय तक जेल में रखा। उनका राजनीतिक और सामाजिक करियर पूरी तरह से बर्बाद करने की कोशिश की गई। इसका खामियाजा उनके परिवारजनों को भी भुगतना पड़ा। इस तरह की कार्यवाही आपातकाल के दौरान भी नहीं हुई थी। जो पिछले कुछ वर्षों में भारत की जांच एजेंसी, सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग द्वारा राजनेताओं पर की जा रही थी। इस फैसले से यह प्रमाणित हो गया है, जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदते हैं, उस गड्ढे में गिरने का जोखिम खोदने वाले के ऊपर भी होता है। आबकारी नीति घोटाले में यही होता हुआ दिख रहा है। ट्रायल कोर्ट के जज ने जो फैसला लिखा है। वह इतना विस्तृत है,उसको नजर अंदाज कर पाना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लिए भी संभव नहीं होगा। कानून का इतने बड़े पैमाने पर बड़े-बड़े नेताओं के खिलाफ इसके पहले कभी दुरुपयोग नहीं किया गया। आपातकाल में नेताओं को कई महीने जेल में जरूर बंद करके रखा गया था। लेकिन उनके ऊपर कोई आपराधिक मामले नहीं चले। भारतीय इतिहास में नेताओं को आपराधिक मामलों में फंसा कर जेल में रखने का अन्य कोई मामला इतिहास में नहीं मिलता है। जिस तरह के हालात अब बनने लगे हैं। उसको लेकर सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग के लिए भविष्य में कानून का दुरुपयोग कर पाना संभव नही होगा। कानून का दुरुपयोग होने पर विरोध दर्ज कराने का सिलसिला शुरू हो गया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह करके दिखा दिया है। इसी तरह से अन्य राज्यों में जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वह भी मुखर होकर गैर कानूनी और अवैधानिक गतिविधियों को रोकने के लिए खुलकर सामने आ रही हैं। न्याय पालिका के ऊपर भी दबाव बढ़ता चला जा रहा है। अभी तक कानून के दुरुपयोग में जांच एजेंसियां, न्यायपालिका के ऊपर भारी पड़ रही थीं। जिस तरह से जांच एजेंसियों की कारगुजारी और सरकारी दबाव इस फैसले से खुलकर सामने आया है उसके बाद न्यायपालिका भविष्य में केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों का वह बचाव नहीं कर पाएंग़ी। केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों का न्याय पालिका के पीछे छुपकर आसानी से वार कर पाना संभव नहीं होगा। अरविंद केजरीवाल ने फैसला आने के बाद दिल्ली में पुनः चुनाव कराने की मांग उठा दी है। चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली को लेकर राजनीतिक दलों के मन में जो संदेह है। जब तक लोग डरे हुए थे। उस समय तक देश की संवैधानिक संस्थाओं में अवैधानिक गतिविधियां हो रहीं थीं। इस फैसले के बाद भविष्य में संभव नहीं होगा। न्याय पालिका को इस तरह के भ्रष्ट और गैर जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है। हाल ही में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ यौन अपराध का मामला दर्ज कराया गया है। उसको लेकर भी देशभर में बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इसे भी एक राजनीतिक षड्यंत्र माना जा रहा है। समय रहते केंद्र सरकार,जांच एजेंसियां तथा न्यायपालिका ने अवैधानिक कार्यवाही को सख्ती के साथ रोकना होगा। अन्यथा इसके गंभीर परिणाम भविष्य में देखने को मिल सकते हैं। कानून का दुरुपयोग राजनीति और लोगों को फंसाने के लिए ना हो, इसकी जिम्मेदारी संविधान ने न्यायपालिका को दी है। न्यायपालिका को और भी ज्यादा सजग होने की जरूरत है। एसजे/ 28 फरवरी /2026