लेख
28-Feb-2026
...


दिल्ली की एक ट्रायल कोर्ट द्वारा कथित आबकारी नीति प्रकरण में आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया तथा अन्य आरोपितों को दोषमुक्त किए जाने का निर्णय समकालीन राजनीतिक और विधिक परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, अर्थात सीबीआई द्वारा पंजीकृत किया गया था और लंबे समय से सार्वजनिक बहस के केंद्र में था। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत आरोप ठोस साक्ष्यों और विश्वसनीय गवाहियों पर आधारित नहीं हैं तथा आरोपपत्र में वर्णित दावे न्यायिक परीक्षण की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। न्यायालय की यह टिप्पणी कि अनुमानों और अटकलों को विधिसम्मत प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, न केवल इस विशेष प्रकरण बल्कि समग्र अन्वेषण प्रक्रिया के लिए भी गंभीर संकेत देती है। आबकारी नीति मामले यह फैसला आप के लिए एक बड़ी संजीवनी या ‘प्राणवायु’के समान है। यह फैसला आप को ‘कट्टर ईमानदार’ की छवि वापस पाने और आगामी चुनावों के लिए एक आक्रामक रुख अपनाने में मदद करेगा, जिससे विपक्षी दलों का मनोबल भी बढ़ा है। कोर्ट से मिली क्लीन चिट ने आप नेताओं की साख बहाल की है जिससे पार्टी कार्यकर्ता उत्साहित हैं। यह निर्णय ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के नैरेटिव को बल देता है जिससे आप अपनी छवि को बेदाग साबित कर पा रही है। विपक्षी दल इस घटना को केंद्रीय एजेंसियों सीबीआई एवं ईडी के कथित दुरुपयोग के खिलाफ एक जीत के रूप में देख रहे हैं जिससे उन्हें केंद्र के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। इस फैसले से दिल्ली और पंजाब में आप को मजबूती मिलेगी और वह आगामी चुनावों के लिए आक्रामक प्रचार कर सकती है। विवाद का मूल वर्ष 2021 में लागू की गई नई आबकारी नीति से जुड़ा था। उस समय दिल्ली सरकार ने तर्क दिया था कि शराब व्यापार में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने से राजस्व में वृद्धि होगी, भ्रष्टाचार कम होगा और व्यवस्था अधिक पारदर्शी बनेगी। किंतु नीति के क्रियान्वयन के बाद उस पर अनियमितताओं तथा कथित पक्षपात के आरोप लगाए गए। यही आरोप आगे चलकर आपराधिक प्रकरण का आधार बने। जुलाई 2022 से यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श का प्रमुख विषय बन गया और चुनावी सभाओं में इसे व्यापक रूप से उठाया गया। अब जबकि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन के तर्कों को अपर्याप्त पाया है, तो स्वाभाविक है कि इसका राजनीतिक प्रभाव भी पड़ेगा। हालांकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने इस निर्णय को दिल्ली उच्च न्यायालय, में चुनौती देने की घोषणा की है। अतः अंतिम विधिक स्थिति अभी स्पष्ट नहीं मानी जा सकती। साथ ही प्रवर्तन निदेशालय, अर्थात ईडी ने यह कहा है कि उससे संबंधित धनशोधन प्रकरण की जांच स्वतंत्र आधारों पर चल रही है। यदि उच्च न्यायालय भी निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठेगा कि समान घटनाक्रम से जुड़े विभिन्न अन्वेषणों की विधिक संगति किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी। इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अन्वेषण एजेंसियों की भूमिका अत्यंत संवेदनशील होती है। वे केवल अपराध की जांच ही नहीं करतीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के प्रारंभिक चरण का प्रतिनिधित्व भी करती हैं। यदि न्यायालय यह टिप्पणी करता है कि जांच पूर्वनिर्धारित दिशा में चलती प्रतीत होती है या पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, तो यह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि संस्थागत शुचिता पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। न्याय का मूल सिद्धांत है कि अभियुक्त तब तक निर्दाेष माना जाता है जब तक कि उसका दोष विधिसम्मत प्रमाणों के आधार पर सिद्ध न हो जाए। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों का प्रभाव केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शासन की समग्र विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो कठोर दंड आवश्यक है; किंतु यदि आरोप पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में टिक नहीं पाते, तो इससे राजनीतिक विमर्श की विश्वसनीयता पर भी आघात पहुँचता है। लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु आरोपों का उपयोग यदि मुख्यतः चुनावी रणनीति के रूप में किया जाता है और वे न्यायालय में प्रमाणित नहीं हो पाते, तो इससे जनता के मन में संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है। इस निर्णय के बाद स्वाभाविक रूप से आम आदमी पार्टी को नैतिक बल प्राप्त हुआ है। किंतु इस तथ्य को केवल किसी एक दल की विजय या पराजय के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इससे व्यापक स्तर पर यह संदेश भी जाता है कि न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र है और वह अभियोजन की कमजोरी को रेखांकित करने से संकोच नहीं करती। न्यायालय की कठोर टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि केवल आरोपों की गंभीरता पर्याप्त नहीं है; उन्हें प्रमाणों की दृढ़ता से पुष्ट करना भी अनिवार्य है। दूसरी ओर, यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि वास्तव में किसी नीति में अनियमितता हुई थी, तो उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य क्यों प्रस्तुत नहीं किए जा सके। क्या अन्वेषण प्रक्रिया में तकनीकी कमियाँ रहीं? क्या साक्ष्य-संग्रह में सावधानी का अभाव था? या फिर आरोपों का प्रारूपण ही पर्याप्त स्पष्ट नहीं था? ये प्रश्न केवल इस प्रकरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भविष्य की जांच प्रक्रियाओं के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। भ्रष्टाचार-निरोध की दिशा में प्रभावी कदम तभी संभव हैं जब अन्वेषण निष्पक्ष, पारदर्शी और विधिसम्मत हो। राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार-विरोध का नैतिक आग्रह तभी प्रभावी है जब वह स्वयं प्रमाण-आधारित हो। यदि आरोपों का आधार कमजोर होगा, तो वे न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएंगे और इससे वास्तविक भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष भी कमजोर पड़ेगा। इस घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है-अन्वेषण एजेंसियों की स्वायत्तता और उत्तरदायित्व का संतुलन। लोकतंत्र में एजेंसियों को स्वतंत्रता आवश्यक है, किंतु वह स्वतंत्रता विधिक मानकों और न्यायिक नियंत्रण के अधीन रहती है। न्यायालय की टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि प्रक्रिया की शुचिता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यदि अभियोजन पक्ष पर्याप्त तैयारी के बिना आरोप प्रस्तुत करता है, तो उसका परिणाम यही होगा कि मामला प्रारंभिक चरण में ही कमजोर पड़ जाएगा। निश्चित तौर पर यह प्रकरण हमें यह स्मरण कराता है कि कानून का शासन केवल दंड देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि न्यायसंगत प्रक्रिया की गारंटी भी है। आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी राज्य पर होती है और वह भी संदेह से परे प्रमाणों के आधार पर। यदि यह मानक पूरा नहीं होता, तो किसी भी व्यक्ति को केवल सार्वजनिक धारणा के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस निर्णय का अंतिम परिणाम चाहे जो भी हो-क्योंकि उच्च न्यायालय में चुनौती लंबित है फिर भी यह अवसर अवश्य प्रदान करता है कि हम भ्रष्टाचार-निरोध की अपनी कार्ययोजना को अधिक सुदृढ़ और प्रमाण-आधारित बनाएं। राजनीतिक विमर्श को आरोपों की तीव्रता से आगे बढ़कर प्रमाणों की गुणवत्ता पर केंद्रित करना होगा। अन्वेषण एजेंसियों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी कार्रवाई निष्पक्षता और विधिक दृढ़ता का उदाहरण बने। लोकतंत्र की शक्ति उसके संस्थानों की विश्वसनीयता में निहित होती है। जब न्यायालय निर्भीक होकर जांच की कमियों को इंगित करता है, तो वह व्यवस्था को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करता है। आवश्यकता इस बात की है कि इस निर्णय को किसी दलगत लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय संस्थागत सुधार के अवसर के रूप में देखा जाए। यदि ऐसा किया जाता है, तो यह प्रकरण केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं रहेगा, बल्कि शासन-प्रणाली की परिपक्वता का प्रमाण भी बनेगा। ईएमएस, 28 फरवरी, 2026