केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई पहली राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी नीति ‘प्रहार’ भारत की आंतरिक सुरक्षा रणनीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है। आज़ादी के 78 वर्ष बाद एक समग्र, लिखित और स्पष्ट आतंकवाद विरोधी नीति का आना इस बात का संकेत है कि सरकार अब प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि सक्रिय और पूर्व-निवारक दृष्टिकोण अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लंबे समय से सुरक्षा विशेषज्ञ यह सवाल उठाते रहे थे कि जिस देश ने दशकों तक सीमा पार प्रायोजित आतंकवाद, अलगाववाद और वैश्विक आतंकी नेटवर्क की चुनौतियों का सामना किया है, उसके पास एक औपचारिक राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी नीति क्यों नहीं है। अब ‘प्रहार’ के माध्यम से केंद्र ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया है। इस नीति का मूल आधार ‘जीरो टॉलरेंस’ यानी आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आतंकवाद को किसी धर्म, जाति या समुदाय से नहीं जोड़ा जाएगा, बल्कि इसे केवल राष्ट्र-विरोधी हिंसक कृत्य के रूप में देखा जाएगा। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि आतंकवाद की चुनौती केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता से भी जुड़ी हुई है। जब नीति यह स्पष्ट करती है कि आतंकवाद किसी विशेष पहचान से संबद्ध नहीं है, तो वह कट्टरपंथ की जड़ों को कमजोर करने की दिशा में भी काम करती है। ‘प्रहार’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हमले के बाद की कार्रवाई से अधिक हमले से पहले रोकथाम पर केंद्रित है। यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। पारंपरिक सुरक्षा मॉडल अक्सर किसी हमले के बाद जांच, गिरफ्तारी और दंड पर केंद्रित होते थे, लेकिन नई नीति में खुफिया तंत्र को सुदृढ़ कर संभावित हमलों को पहले ही विफल करने पर जोर दिया गया है। मल्टी एजेंसी सेंटर के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को तेज और प्रभावी बनाने का प्रयास इसी सोच का हिस्सा है। यदि विभिन्न एजेंसियों के पास मौजूद सूचनाएं समय रहते साझा हों और उन पर त्वरित कार्रवाई हो, तो कई बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है। नीति में अल-कायदा और आइएसआइएस जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों से खतरे का उल्लेख यह दर्शाता है कि भारत अपनी सुरक्षा को केवल घरेलू संदर्भ में नहीं देख रहा, बल्कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी आकलन कर रहा है। अल कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठन डिजिटल माध्यमों से युवाओं को प्रभावित करने और उन्हें कट्टरपंथ की ओर धकेलने की रणनीति अपनाते रहे हैं। ऐसे में नीति का डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, एन्क्रिप्शन, डार्क वेब और क्रिप्टोकरेंसी के दुरुपयोग पर ध्यान देना समय की मांग है। आज आतंकवाद केवल बंदूक और बम तक सीमित नहीं है; यह साइबर हमलों, ड्रोन तकनीक, फेक न्यूज और ऑनलाइन भर्ती के रूप में भी सामने आ रहा है। ड्रोन हमलों और साइबर अटैक जैसी नई चुनौतियों का उल्लेख इस नीति को आधुनिक बनाता है। सीमाओं पर ड्रोन के माध्यम से हथियार और मादक पदार्थ गिराने की घटनाएं पिछले वर्षों में सामने आई हैं। साइबर हमलों के जरिए महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना को निशाना बनाया जा सकता है। रासायनिक, जैविक या परमाणु हमलों की आशंका भले ही कम हो, लेकिन उनका प्रभाव विनाशकारी हो सकता है। इसलिए नीति में इन सभी संभावित खतरों के प्रति तैयारी और सतर्कता पर जोर दिया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ‘प्रहार’ केवल वर्तमान खतरों तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को भी ध्यान में रखती है। आतंकी संगठनों और संगठित अपराध गिरोहों के गठजोड़ पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। कई बार आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन की व्यवस्था हवाला, मादक पदार्थों की तस्करी या अन्य आपराधिक गतिविधियों से की जाती है। यदि इन फंडिंग चैनलों को तोड़ा जाए और ओवरग्राउंड वर्कर्स के नेटवर्क को खत्म किया जाए, तो आतंकवाद की जड़ों को कमजोर किया जा सकता है। नीति में इस दिशा में कठोर कदम उठाने की बात कही गई है। इससे आतंकवाद के आर्थिक स्रोतों पर चोट पहुंचेगी। केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। भारत जैसे संघीय ढांचे वाले देश में कानून-व्यवस्था मुख्यतः राज्य का विषय है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा में केंद्र की भूमिका प्रमुख होती है। यदि दोनों स्तरों पर समन्वय में कमी हो, तो सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। ‘प्रहार’ में राज्यों की एटीएस और आतंकवाद रोधी इकाइयों की क्षमता बढ़ाने, प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और तकनीकी संसाधनों के विस्तार पर जोर दिया गया है। इससे पूरे देश में एक समान और मजबूत आतंकवाद रोधी ढांचा तैयार किया जा सकेगा। नीति में मानवाधिकारों और कानून के शासन को बनाए रखने की बात भी महत्वपूर्ण है। आतंकवाद से लड़ाई में कठोरता आवश्यक है, लेकिन कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्रवाई होनी चाहिए। आरोपी को न्यायिक प्रक्रिया और अपील का अधिकार देना लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है। इससे सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम रहता है। यह संदेश भी जाता है कि भारत आतंकवाद से लड़ते हुए भी अपने संवैधानिक सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा। कट्टरपंथ को रोकने के लिए युवाओं की समय रहते पहचान और परामर्श की व्यवस्था, जेलों में उग्र विचारधारा के प्रसार को रोकने के उपाय तथा शिक्षा और रोजगार के माध्यम से सामाजिक कमजोरियों को दूर करने की सोच नीति को केवल सुरक्षा दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का माध्यम भी बनाती है। यदि युवा कट्टरपंथ की ओर आकर्षित ही न हों, तो आतंकवादी संगठनों की भर्ती प्रक्रिया कमजोर पड़ जाएगी। इस दृष्टि से ‘प्रहार’ सामाजिक भागीदारी और पुनर्वास पर भी जोर देती है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बात इस नीति को वैश्विक आयाम देती है। अन्य देशों के साथ सूचना साझा करना, प्रत्यर्पण समझौते और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर आतंकियों को नामित कराने के प्रयास भारत की कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाते हैं। आतंकवाद आज सीमा-रहित चुनौती बन चुका है, इसलिए उसका समाधान भी वैश्विक सहयोग से ही संभव है। यदि पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो आतंकी हमलों और मौतों में कमी आई है। 2004-14 की तुलना में 2014-25 के बीच घटनाओं और हताहतों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। यह प्रवृत्ति बताती है कि सुरक्षा तंत्र ने कुछ हद तक प्रभावी काम किया है। ‘प्रहार’ जैसी नीति इस कमी को और मजबूत कर सकती है, क्योंकि यह संरचनात्मक सुधार और दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित है। कुल मिलाकर, ‘प्रहार’ केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि आतंकवाद के विरुद्ध भारत की समग्र सोच का प्रतिबिंब है। इसमें सुरक्षा, तकनीक, सामाजिक जागरूकता, कानूनी संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समावेश है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच वास्तविक समन्वय स्थापित हुआ, और समाज की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई, तो निश्चित रूप से आतंकवाद की घटनाओं में और कमी लाई जा सकती है। यह नीति भारत की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ युवाओं को भटकाव से बचाने और राष्ट्र को स्थिर, सुरक्षित और सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40424 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस/02/03/2026