झाबुआ (ईएमएस)चैत्र मास कृष्ण पक्ष दशमी तिथि पर आज शुक्रवार को जिला मुख्यालय सहित जिले के नगरीय इलाकों एवं दूरस्थ आंचलिक गांवों में महिलाओं द्वारा श्रद्धा, विश्वास के साथ हर्षोल्लास पूर्वक दशा माता का व्रत रखते हुए विधि विधान से अश्वत्थ वृक्ष की पूजा अर्चना की गई। दशा माता व्रत पूजा का सिलसिला बड़े सबेरे से ही आरंभ हो गया था, जो कि दोपहर तक अनवरत रूप से जारी है। जिले के जनजातीय अंचलों में भी महिलाओं द्वारा पीपल वृक्ष की पूजा कर देवी दशा माता का व्रत रखा गया। दशा माता व्रत विधानानुसार जिला मुख्यालय पर तालाब किनारे स्थित जैन नसिया के समीप प्राचीन अश्वत्थ वृक्ष सहित सिद्धेश्वर कालोनी में श्री सिद्धेश्वरी देवी मंदिर परिसर एवं गोपाल कालोनी स्थित पुराने पीपल वृक्ष की पूजा अर्चना की गई, जबकि मेघनगर में रामदेव मंदिर, शीतला माता मंदिर, टीचर्स कालोनी सहित थांदला में श्रीगणेश मंदिर, श्री तेजाजी मंदिर एवं श्री पट्टाभिराम मंदिर के समक्ष स्थित पीपल वृक्ष की पूजा अर्चना करते हुए परिक्रमा कर दशा माता व्रत विधान किया गया। जिले के सुदूर अंचलों में भी जनजातीय समुदाय की महिलाओं द्वारा पीपल के वृक्ष की पूजा कर व्रत विधान किया जा रहा है। जिला मुख्यालय की सिद्धैश्वर कालोनी स्थित देवी सिद्धेश्वरी मंदिर सहित जिले के विभिन्न नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने अश्वत्थ वृक्षों को प्राण प्रतिष्ठित किया जा चुका है। ऐसे में ये प्राचीन वृक्ष सुरक्षित होकर पर्यावरण को स्वच्छ करते हुए हमारे स्वास्थ्य रक्षक बने हुए हैं। पौराणिक मान्यता अनुसार अश्वत्थ या पीपल के वृक्ष में भगवान श्री विष्णु सहित देवी लक्ष्मी का वास बताया गया है, इसलिए हमारे ऋषि मुनियों द्वारा आज के दिन व्रत रखते हुए पीपल के वृक्ष की पूजा का विधान सुनिश्चित किया गया है। आज के दिन किए जाने वाले पूजा विधान से एक ओर जहां धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा बलवती होती है, ओर वृक्षों के संरक्षण और पौधारोपण का भाव भी द्रढ़ीभूत होता है हमारे धर्म शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि चैत्र कृष्ण पक्ष दशमी तिथि के दिन पीपल के वृक्ष में भगवान् श्री हरि विष्णु देवी लक्ष्मी सहित निवास करते हैं। इस दिन पीपल को जल और कच्चे दूध से सींचा जाता है। धर्म शास्त्रों में उल्लेखित कथन अनुसार जिले में विभिन्न स्थानों पर महिलाओं द्वारा सर्व प्रथम पीपल के वृक्ष की विधि विधान पूर्वक विभिन्न सामग्रियों से पूजा अर्चना की, और उसके चारों तरफ कच्चा सूत बांधा। पूजा विधान में भांति भांति के नैवेद्य निवेदित कर अंत में पीपल के वृक्ष की परिक्रमा की गई। जिले में विभिन्न स्थानों पर विद्वान ब्राह्मणों द्वारा दशा माता के प्रतीक स्वरूप पीपल वृक्ष की पूजा संपन्न कराई गई, और दशा माता की कथा के रूप में महाराज नल और देवी दमयंती रानी की कहानी सुनाई गई। उल्लेखनीय है कि इस व्रत में माताजी का धागा जिसमें दस गांठे लगाई जाती हैं, सुहागिन महिलाएं अपने गले में धारण करती हैं। कई स्थानों पर महिलाओं द्वारा सिर्फ दशा माता के व्रत के दिन दशा माता का धागा पूरे दिन धारण किया जाता है, जबकि कुछ महिलाएं इसे पूरे वर्ष भर धारण किए रहती है। किंतु यदि साल भर पहनना संभव न हो तो किसी भी वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष में अच्छा दिन देखकर पीपल के पेड़ पर या मां पार्वती के चरणों में इस डोरे को समर्पित कर दिया जाता है। जिले में इस व्रत को परिवारिक परंपरानुसार किया जाता रहा है। दशा माता के इस व्रत में एक समय का भोजन किया जाता है, किंतु कुछ महिलाएं इस दिन पूरा उपवास भी रखती है। सुहागिन महिलाएं इस व्रत को आजीवन रखती है, और इस व्रत का उद्यापन नहीं किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि आज के इस पवित्र एवं ऊर्जा वान दिन अश्वत्थ वृक्ष की छाल को कनिष्ठका अंगुली से निकालकर तथा लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखा जाए, और पूजनोपरांत घर आकर मुख्य दरवाजे पर हल्दी और कुमकुम के मंगल चिन्ह बनाए जाएं तो वर्ष भर घर में शुभ मङ्गल, ऐश्वर्य, सुख शांति बनी रहती हैं। ईएमएस/ डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा /13/3/२०२६