नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ कथित तौर पर जातिसूचक गालियां देने के मामले में आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल इस आधार पर एफआईआर की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित की शिकायत पर नहीं, बल्कि पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपियों को अग्रिम जमानत दी गई थी। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एफआईआर की सत्यता पर संदेह जताया था कि वह कथित पीड़ित की शिकायत पर नहीं, बल्कि एक पुलिस अधिकारी के बयान पर दर्ज की गई थी। यह मामला दो पक्षों के बीच हुए एक विवाद से जुड़ा है। अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों का आरोप था कि ऊंची जाति के लोगों के घरों की नालियों का पानी उनके घरों की ओर मोड़ा जा रहा था। जब प्रभावित लोगों ने इसका विरोध किया, तो इलाके में तनाव बढ़ गया। स्थिति को संभालने और समझौता कराने के लिए पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन इस दौरान कथित तौर पर विवाद हिंसक हो गया। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने न केवल जातिसूचक गालियां दीं, बल्कि हथियारों का भी इस्तेमाल किया और फायरिंग की। घटना का वीडियो मौजूद होने की भी बात कही गई है। सुबोध/१३-०३-२०२६