विशाखा एक शहर में हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में रहती थी। कॉलोनी के बीचों-बीच एक सुंदर सार्वजनिक पार्क था। चारों ओर हरे-भरे पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे फूल, बच्चों के झूले और फिसलन-पट्टी उसे जीवंत बनाते थे। सुबह-शाम कॉलोनी के बच्चे, बुजुर्ग और परिवार के लोग वहां टहलने, बैठकर बातें करने और समय बिताने आया करते थे। गर्मियों के दिन शुरू हुए तो किसी संवेदनशील व्यक्ति ने पक्षियों के लिए पेड़ों पर सात-आठ परिंडे टांग दिए। पार्क के एक कोने में दाना चुगने का स्थान भी बना था, जहां तोते, कबूतर, कौवे, गौरैया और कभी-कभी मोर भी आकर दाना चुगते थे। परंतु भीषण गर्मी में कुछ ही दिनों में उन परिंडों का पानी सूख गया। लोग रोज़ पार्क में आते, घूमते, बातें करते, बच्चे खेलते, लेकिन किसी की नज़र उन सूखे परिंडों पर नहीं ठहरती। विशाखा की नज़र भी कई बार उन पर गई थी, फिर भी उसने इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं समझी। मन में बस एक विचार आता-यह काम मेरा अकेले का नहीं है, कॉलोनी में और भी लोग हैं। एक दिन उसका बेटा अमन पार्क में खेलते-खेलते उन परिंडों के पास पहुंच गया। उसने देखा कि वे पूरी तरह सूखे पड़े हैं। घर आकर उसने अपनी मां से कहा, मम्मा, पार्क में पक्षियों के परिंडों में कई दिनों से पानी नहीं है। विशाखा ने सहज भाव से उत्तर दिया, कॉलोनी में इतने लोग हैं, क्या सिर्फ हमारी ही जिम्मेदारी है इन्हें भरने की? अमन ने शांत स्वर में कहा, मम्मा, जिम्मेदारी सबकी होती है, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी उसे निभाने से बचना सबसे बड़ी मूर्खता है।बेटे की बात सुनकर विशाखा कुछ पल के लिए मौन रह गई। उसे लगा-कभी-कभी छोटे बच्चे भी हमें बड़ा सच सिखा जाते हैं। विशाखा को अपने कर्तव्यबोध का अहसास हो चुका था। (फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार) .../ 16 मार्च /2026